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लंका शक्तिपीठ शक्तिपीठ

Lanka Shakti Peeth — वाम पाद तल से संबंधित प्रमुख शक्तिपीठ

लंका शक्ति पीठ पश्चिम बंगाल में स्थित एक अत्यंत पवित्र शक्ति पीठ है। यह पीठ बाएँ पैर के तलवे के गिरने से संबंधित है और यहाँ माँ भ्रामरी देवी की पूजा की जाती है। भ्रामरी देवी को भ्रमरों की देवी माना जाता है और उनका नाम भ्रमर से संबंधित है। यह पीठ बंगाल की अत्यंत प्राचीन तीर्थ स्थलों में से एक है। यहाँ भैरव के रूप में चण्ड भैरव की पूजा की जाती है।

परिचय

लंका शक्ति पीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित एक प्राचीन और अत्यंत पवित्र शक्ति पीठ है। यह पीठ 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। यहाँ माँ भ्रामरी देवी की पूजा की जाती है, जो दुर्गा का एक विशेष रूप हैं। भ्रामरी देवी को भ्रमरों की रानी माना जाता है और उन्हें अत्यंत कृपालु माना जाता है। भैरव चण्ड यहाँ देवी के साथ विराजमान हैं। यह पीठ बंगाल की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लंका शब्द का शाब्दिक अर्थ है निवास स्थान या शहर। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह नाम रावण की लंका से संबंधित है, जहाँ देवी की पूजा की जाती थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह स्थान लंका के नाम पर इसलिए रखा गया क्योंकि यहाँ देवी की पूजा रावण द्वारा भी की जाती थी।

पौराणिक कथा

शक्ति पीठों की कथा सती और शिव से जुड़ी है। जब सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह किया, तब भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। सती के शरीर के 51 टुकड़े भारत के विभिन्न स्थानों पर गिरे।

लंका शक्ति पीठ वह स्थान है जहाँ सती का बायाँ पैर का तलवा गिरा था। पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि भ्रामरी देवी ने यहाँ भ्रमरों की सेना के साथ राक्षसों का वध किया। ऐसा माना जाता है कि देवी ने भ्रमरों की भनभनाहट से राक्षसों को भ्रमित किया और फिर उनका वध किया।

भौगोलिक स्थिति

लंका शक्ति पीठ पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है। यह स्थान बंगाल के मैदानी क्षेत्र में आता है। निकटतम रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा कोलकाता में स्थित है। यह क्षेत्र गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान का हिस्सा है।

आसपास के क्षेत्र में कृषि मुख्य व्यवसाय है। यह क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है।

ऐतिहासिक महत्व

लंका शक्ति पीठ का ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गहरा है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, यह मंदिर प्राचीन काल से चला आ रहा है। मध्यकाल में बंगाल के राजाओं ने इस मंदिर के संरक्षण के लिए अनेक दान दिए।

मुगल काल में भी यह मंदिर अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रहा। ब्रिटिश काल में भी इस मंदिर का उल्लेख अभिलेखों में मिलता है।

धार्मिक परंपरा

लंका शक्ति पीठ में भ्रामरी देवी की पूजा विशेष विधि-विधान से की जाती है। देवी की मूर्ति काले पत्थर से निर्मित है और वह अष्टभुजाओं वाली हैं। देवी की पूजा में शहद का विशेष महत्व है क्योंकि भ्रामरी देवी को भ्रमरों की देवी माना जाता है।

इस पीठ में नवरात्रि के नौ दिनों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। दुर्गा पूजा के दौरान यहाँ विशेष उत्सव का आयोजन किया जाता है।

वार्षिक उत्सव

लंका शक्ति पीठ में वर्ष भर विभिन्न धार्मिक उत्सवों का आयोजन किया जाता है। सबसे प्रमुख उत्सव नवरात्रि और दुर्गा पूजा है। इन अवसरों पर मंदिर को सुंदर ढंग से सजाया जाता है।

मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, रक्षाबंधन और काली पूजा भी यहाँ बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है।

यात्रा मार्गदर्शन

लंका शक्ति पीठ तक पहुँचने के लिए कोलकाता का हवाई अड्डा निकटतम है। सड़क मार्ग से मंदिर तक आसानी से पहुँचा जा सकता है।

मंदिर के आसपास कई धर्मशालाएँ हैं। मंदिर सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक खुला रहता है।

विभिन्न परंपराओं में मतभेद

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बाएँ पैर का तलवा यहाँ गिरा था

— शैव परंपरा
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भ्रामरी देवी - भ्रमरों की देवी, अष्टभुजाओं वाली

— शाक्त परंपरा
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चण्ड भैरव - इस पीठ के रक्षक भैरव

— शैव परंपरा
Location

पश्चिम बंगाल - गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान में

— ऐतिहासिक परंपरा
Tradition

भ्रामरी परंपरा - शहद और भ्रमरों से संबंधित पूजा

— तांत्रिक परंपरा

मतभेद और टिप्पणी

लंका शक्ति पीठ के स्वामित्व को लेकर कुछ विवाद रहे हैं। सबसे प्रमुख विवाद यह है कि कुछ विद्वानों का मानना है कि यह पीठ मूल रूप से एक बौद्ध स्थल था।

संपादकीय टिप्पणी:

लंका शक्ति पीठ बंगाल की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है। हमारा प्रयास है कि इस पीठ के बारे में सटीक जानकारी प्रदान की जाए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लंका शक्ति पीठ में माँ भ्रामरी देवी की पूजा की जाती है। वह भ्रमरों की देवी हैं।

यह पीठ सती के बाएँ पैर के तलवे के गिरने से संबंधित है।

भ्रामरी देवी की पूजा में शहद का विशेष महत्व है।

निकटतम रेलवे स्टेशन कोलकाता जंक्शन है।

दुर्गा पूजा के दौरान मंदिर को सुंदर ढंग से सजाया जाता है।

संबंधित शक्तिपीठ

स्रोत और संदर्भ

  • बंगाल के शक्ति पीठ — डॉ. राजेश्वर चट्टोपाध्याय , कलकत्ता विश्वविद्यालय प्रकाशन
  • भारतीय तीर्थ स्थलों का इतिहास — डॉ. भारती नाथ मुखोपाध्याय , ओरिएंटल बुक सेंटर
  • बंगाल का इतिहास — राजशेखर बसु , विश्वविद्यालय प्रकाशन
  • मार्कंडेय पुराण — वेदव्यास , भारतीय धर्म ग्रंथ
  • देवी माहात्म्य — वेदव्यास , भारतीय धर्म ग्रंथ
  • शक्ति पीठ चरण — अद्वैत वेदांत , तांत्रिक ग्रंथ
  • भारतीय मंदिर वास्तुकला — माइकल मीस्टर , ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
  • लंका शक्ति पीठ आधिकारिक वेबसाइट — लंका मंदिर समिति , लंका शक्ति पीठ [link]
  • दुर्गा सप्तशती — मार्कंडेय ऋषि , भारतीय धर्म ग्रंथ