विवाह संस्कार (पाणिग्रहण) षोडश संस्कारों में सबसे प्रमुख संस्कार है। 'विवाह' का शाब्दिक अर्थ है — विशेष रूप से उत्तरदायित्व का वहन करना। हिंदू विवाह केवल पति-पत्नी का अनुबंध नहीं, वरन् जन्म-जन्मांतर का पवित्र बंधन है, जो पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर संपन्न किया जाता है। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 (धारा 7) के अनुसार भी विवाह की पूर्णता सप्तपदी पर निर्भर है।
विवाह का शास्त्रीय आधार
ऋग्वेद 10.85 (सूर्या-सूक्त) तथा आश्वलायन-पारस्कर गृह्यसूत्रों में विवाह की समस्त विधि वर्णित है। पाणिग्रहण का प्रसिद्ध मंत्र —
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥ — ऋग्वेद 10.85.36
विवाह से पूर्व के कृत्य
१. वरण एवं मधुपर्क
वर-पक्ष के आगमन पर कन्या-पक्ष द्वारा वर का स्वागत (वरण), मधुपर्क-पान एवं पाद्य-प्रक्षालन का विधान है।
२. गणेश पूजन एवं ग्रह शांति
विवाह मंडप में सर्वप्रथम गणेश पूजन, नवग्रह पूजन एवं ग्रह शांति संपन्न की जाती है, ताकि संस्कार निर्विघ्न संपन्न हो।
विवाह के मुख्य अनुष्ठान
१. कन्यादान
कन्यादान हिंदू जीवन का सबसे बड़ा दान माना गया है। कन्या के पिता पवित्र जल-अर्पण के साथ कन्या का दाहिना हाथ वर के दाहिने हाथ में रखते हुए उसे विष्णु-स्वरूप वर को समर्पित करते हैं —
दद्यां ब्रह्मलोकप्राप्तये विष्णवे त्वां मह्यमर्पयामि ॥
२. हस्तपीतकरण एवं ग्रन्थिबन्धन
कन्या की हथेलियों पर हल्दी-लेपन कर वर-वधू के वस्त्रों की ग्रन्थि बाँधी जाती है — यह दोनों के एक होने का प्रतीक है।
३. अग्नि स्थापना एवं लाजाहोम
यज्ञाग्नि स्थापित कर कन्या द्वारा लाजा (धान की खील) की आहुति दी जाती है। अग्नि विवाह की दिव्य साक्षी है।
४. पाणिग्रहण
वर ऋग्वेद 10.85.36 मंत्र द्वारा वधू का हाथ थामता है, जिससे वधू सौभाग्यवती एवं जरा-अवस्था तक साथ चलने वाली सहधर्मिणी बनती है।
५. सप्तपदी (सात कदम)
विवाह का सर्वाधिक बंधनकारी अनुष्ठान सप्तपदी है — सात कदमों पर ही विवाह पूर्ण और अटूट माना जाता है।
| कदम | संकल्प | मंत्र (संक्षेप) |
|---|---|---|
| प्रथम | अन्न-पोषण एवं जीविका | ॐ इषे एकपदी भव विष्णुस्त्वान्वेतु |
| द्वितीय | बल-शक्ति | ॐ ऊर्जे द्विपदी भव विष्णुस्त्वान्वेतु |
| तृतीय | धन-समृद्धि एवं धर्म | ॐ रायस्पोषाय त्रिपदी भव विष्णुस्त्वान्वेतु |
| चतुर्थ | सुख-शांति | ॐ मयोभवाय चतुष्पदी भव विष्णुस्त्वान्वेतु |
| पञ्चम | संतान | ॐ प्रजाभ्यः पञ्चपदी भव विष्णुस्त्वान्वेतु |
| षष्ठ | ऋतु-अनुकूल आरोग्य | ॐ ऋतुभ्यः षट्पदी भव विष्णुस्त्वान्वेतु |
| सप्तम | शाश्वत मैत्री | ॐ सखे सप्तपदी भव विष्णुस्त्वान्वेतु |
६. मंगलसूत्र एवं सिन्दूर
सप्तपदी के बाद वर वधू के गले में मंगलसूत्र बाँधता है एवं मांग में सिन्दूर-धारण कराता है — यह सदा-सौभाग्य का चिह्न है।
७. ध्रुव एवं अरुन्धती दर्शन
निश्चल भाव से स्थिर रहने एवं पतिव्रता धर्म के लिए वधू को ध्रुव तारा एवं अरुन्धती (वसिष्ठ-पत्नी) का दर्शन कराया जाता है।
८. आशीर्वाद एवं शांति-पाठ
अंत में बुजुर्गों का आशीर्वाद एवं पूर्णाहुति के साथ शांति-पाठ — 'सह नौ भुनक्तु' किया जाता है, तत्पश्चात् ब्राह्मण-भोजन एवं दान-दक्षिणा का विधान है।
विवाह संस्कार के नियम
- विवाह वर-वधू की कुंडली मिलान तथा शुभ मुहूर्त में ही संपन्न करें।
- सप्तपदी अग्नि की साक्षी में ही लें — सातवें कदम पर विवाह पूर्ण माना जाता है।
- विवाह-मंडप में हवन एवं मंत्रोच्चार वैदिक विधि से संपन्न हों।
- विवाह के समय वर-वधू पवित्रता (संयम, सात्त्विक भोजन) का पालन करें।
- संस्कार के उपरांत गुरु-दक्षिणा, ब्राह्मण भोजन एवं दान का विधान है।