गृहस्थ प्रवेश संस्कार (गृह प्रवेश) नव-निर्मित गृह में प्रवेश करने से पूर्व की जाने वाली वास्तु-पूजा एवं प्रवेश-विधि है। विवाहोपरांत नव दंपत्ति का वर के घर प्रवेश भी लौकिक गृह-प्रवेश माना जाता है। गृह्यसूत्रों में वास्तु-पूजा को गृह-प्रवेश का अनिवार्य अंग बताया गया है। ऋग्वेद (7.54) के वास्तोष्पते सूक्त से वास्तु-देवता (गृहपालक देव) की स्तुति की जाती है, जिससे गृह में सुख, शांति एवं समृद्धि का वास होता है।
गृह प्रवेश के प्रकार
- नव गृह प्रवेश: नव-निर्मित घर में पहली बार प्रवेश।
- प्रवास पश्चात् गृह प्रवेश: लंबे प्रवास के बाद गृह में प्रवेश।
- जीर्ण गृह प्रवेश: पुराने घर की मरम्मत/पुनर्निर्माण के बाद प्रवेश।
- विवाहोपरांत गृह प्रवेश (गृहस्थ प्रवेश): नववधू का वर के घर में प्रवेश।
शुभ मुहूर्त
- उत्तरायण काल, शुक्ल पक्ष के दिन।
- रोहिणी, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तरा भाद्रपद, मृगशिरा, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, श्रवण, रेवती नक्षत्र शुभ माने गए हैं।
- अमावस्या, ग्रहण, मलमास, संक्रांति एवं सूर्य-दक्षिणायन के दिन गृह प्रवेश वर्जित है।
- गृह-प्रवेश प्रातःकाल सूर्य की रोशनी में करना उत्तम है।
वास्तु पूजा का महत्व
शास्त्रों के अनुसार वास्तु-पूजा से गृह के वास्तु-दोष समाप्त होते हैं तथा निवासियों को शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक हानियों से रक्षा मिलती है। वास्तु देवता (वास्तुपुरुष) को गृह का रक्षक माना गया है। पूजा से पूर्व गृह का शुद्धिकरण (सफाई, गंगाजल-छिड़काव, गोबर-लेपन) आवश्यक है।
गृह प्रवेश पूजा की सामग्री
- मंगल कलश, नारियल, आम/अशोक के पत्ते, मौली (कलावा), सुपारी, दूर्वा,
- गंगाजल, पंचामृत, रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, कपूर,
- गणेश एवं लक्ष्मी की मूर्ति/चित्र, सप्तधान्य (7 प्रकार के अनाज), तिल, जौ, घी,
- हवन सामग्री, दूध, शहद, दही, गुड़, चावल, फल, मिठाई, स्वर्ण-रजत सिक्का, श्री यंत्र।
गृह प्रवेश विधि (क्रमशः)
१. गृह-शुद्धि एवं संकल्प
घर की संपूर्ण सफाई कर गंगाजल/गोमूत्र छिड़कें। प्रवेश-दिन प्रातः स्नान कर सात्त्विक वस्त्र धारण करें। वास्तु-कर्म का संकल्प करें —
२. कलश स्थापना एवं गणेश पूजन
गृह के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में कलश स्थापित करें — जल, सुपारी, दूर्वा, सिक्का सहित, मुख पर आम के पत्ते तथा नारियल, लाल वस्त्र एवं कलावा सहित। सर्वप्रथम गणेश पूजन करें —
३. वास्तु पूजन एवं वास्तु-हवन
वास्तु पुरुष का आवाहन-पूजन करें —
यत्त्वेमहे प्रतितन्नो जुषस्व शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥ — ऋग्वेद 7.54.1
नवग्रह पूजन, दिक्पाल पूजन (इंद्र, अग्नि, यम, निऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान) करें। वास्तु-शांति मंत्रों से हवन करें — घी, समिधा, तिल, जौ की आहुतियाँ दें। हवन के अंत में पूर्णाहुति दें।
४. गृह प्रवेश
शुभ मुहूर्त में गृहस्वामी सपरिवार दाहिना पैर पहले रखकर गृह में प्रवेश करें। प्रवेश के समय कलश, दीपक, धान्य एवं श्री यंत्र साथ ले जाएँ। पहले गणेश-लक्ष्मी की स्थापना करें, तत्पश्चात् रसोई में दूध उबालकर उसे उफनने दें — यह समृद्धि का प्रतीक है।
५. लक्ष्मी पूजन एवं आरती
गृह की स्थापना के बाद लक्ष्मी-गणेश की पूजा कर आरती करें —
६. दान-दक्षिणा एवं ब्राह्मण भोजन
अंत में गुरु-दक्षिणा, ब्राह्मण भोजन तथा यथाशक्ति दान करें और समस्त आत्मीयजनों को प्रसाद वितरित करें।
गृह प्रवेश के विशेष नियम
- गृह प्रवेश वास्तु-पूजन के पश्चात् ही करें।
- प्रवेश के दिन पति-पत्नी का उपवास एवं संयम का विधान है।
- प्रवेश दाहिना पैर पहले रखकर करें; सबसे पहले देव-स्थापना करें।
- रसोई में सर्वप्रथम दूध उबालें — यह धन-धान्य की वृद्धि का प्रतीक है।
- विवाहोपरांत नववधू के प्रवेश पर उसके पैरों को रोली से चिह्नित कर दहलीज पर चावल-अक्षत रखने की लोक-परंपरा है।