उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत/जनेऊ/व्रतबंध) षोडश संस्कारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। 'उपनयन' का अर्थ है — गुरु के निकट ले जाना। इस संस्कार से बालक द्विज (दो बार जन्म लेने वाला) कहलाता है — पहला जन्म माता से, दूसरा जन्म गुरु से। इसके बाद बालक गायत्री मंत्र का अधिकारी बनता है और ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश कर वेदाध्ययन का आरंभ करता है।
उपनयन का शास्त्रीय काल
मनुस्मृति तथा आश्वलायन गृह्यसूत्र (खंड 19, सूत्र 1-4) के अनुसार —
| वर्ण | उपनयन का वर्ष |
|---|---|
| ब्राह्मण | गर्भ से आठवाँ वर्ष |
| क्षत्रिय | गर्भ से ग्यारहवाँ वर्ष |
| वैश्य | गर्भ से बारहवाँ वर्ष |
व्यवहार में जन्म से गणना भी प्रचलित है। यदि निर्धारित काल में न हो सके तो सोलहवें वर्ष तक करने का विधान है। उपनयन मुख्यतः उत्तरायण, शुक्ल पक्ष में शुभ नक्षत्र एवं गुरु-शुक्रादि अनुकूल मुहूर्त में करें।
उपनयन का महत्व एवं प्रतीक
- मनुस्मृति 2.170 के अनुसार इस द्वितीय जन्म में सावित्री माता और आचार्य पिता होते हैं।
- तीन सूत्रों का जनेऊ गायत्री के तीन चरणों का प्रतीक है; प्रत्येक लड़ में तीन धागे तथा तीन गाँठें भूः-भुवः-स्वः व्याहृतियों का प्रतीक हैं।
- जनेऊ धारण का अर्थ है — स्वार्थरहित, अनुशासित एवं वैदिक आदर्शों पर आधारित जीवन जीने का संकल्प।
- बृहस्पति उपनयन के प्रमुख देवता माने गए हैं।
उपनयन की सामग्री
- यज्ञोपवीत (हल्दी-रंगा पीला), मेखला (मौंजी), कौपीन, अजिन (मृगचर्म), दण्ड (पलाश/बिल्व/गूलर), कमंडलु,
- रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पुष्प, दीपक, घी, कपूर, गंगाजल,
- हवन सामग्री, नारियल, फल, मिठाई, गुरु-दक्षिणा।
उपनयन विधि (क्रमशः)
१. पूर्व-तैयारी
संस्कार से एक दिन पूर्व (या तीन दिन पूर्व) से बालक को केवल दूध पीने का नियम है। पिता गायत्री मंत्र का 12,000 बार जप तथा गृहयज्ञ का संकल्प करता है। बालक का मुंडन कराया जाता है (शिखा रखते हुए)।
२. मेखला एवं कौपीन धारण
आचार्य गायत्री मंत्र से मेखला और कौपीन को अभिमंत्रित कर बालक की कमर में मौंजी बाँधते हैं —
प्राणापानाभ्यां बलमादधाना सुभगा मेखलेयम् ॥
३. अजिन धारण
मंत्रोच्चारण के साथ बालक को अजिन (मृगचर्म) धारण कराया जाता है — भावना कि यह साधना का आसन है।
४. यज्ञोपवीत धारण
जनेऊ को जल से प्रोक्षण कर दस बार गायत्री का उच्चारण कर अभिमंत्रित करें, तत्पश्चात् बालक को धारण कराएँ —
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ — पारस्कर गृह्यसूत्र २.२
५. गायत्री उपदेश (ब्रह्मोपदेश)
यह उपनयन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। आचार्य बालक के कान में गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हैं —
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
६. दण्ड-धारण
बालक को पलाश (ब्राह्मण), बिल्व (क्षत्रिय) या गूलर (वैश्य) का दण्ड प्रदान किया जाता है —
तमहं पुनराददे आयुषे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय ॥
७. भिक्षा-चर्या
बटु माता से प्रारम्भ कर 'ॐ भवति भिक्षां देहि' कहकर भिक्षा माँगता है और भिक्षान्न आचार्य को समर्पित करता है — यह विनम्रता एवं गुरु के प्रति समर्पण की शिक्षा है। अंत में आचार्य एवं ब्राह्मणों का भोजन-पूजन कर गुरु-दक्षिणा दें।
यज्ञोपवीत (जनेऊ) के नियम
- जनेऊ बाएँ कंधे-दाहिनी भुजा से होकर उतरता है (सव्य); पितृ-कर्म में अपसव्य (दाहिने कंधे-बाएँ भुजा) धारण करें।
- ब्रह्मचारी 3 सूत्र तथा गृहस्थ 6 सूत्र (दो लड़ों) का जनेऊ धारण करता है।
- शौच/मूत्र-विसर्जन के समय जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ाएँ, तत्पश्चात् जल-शुद्धि कर उतारें।
- जनेऊ को शरीर से अलग न करें; सूतक (जन्म-मृत्यु) के बाद नवीन जनेऊ धारण करें।
- खंडित/जीर्ण जनेऊ तत्काल बदलें तथा प्रतिदिन गायत्री जप अनिवार्य है।
उपनयन के विशेष नियम
- उपनयन में आवश्यक हो तो मुंडन (चूड़ाकर्म) भी करा लें।
- व्रत-स्थ बटु को दिन में नींद, अनुचित आहार एवं व्यवहार का त्याग करना चाहिए।
- सोलह वर्ष के उपरान्त उपनयन न होने पर प्रायश्चित्त सहित संस्कार कराने का विधान है।
- गुरु-दक्षिणा एवं ब्राह्मण-भोजन उपनयन का अनिवार्य अंग है।