मुंडन संस्कार (चूड़ाकर्म/चौलकर्म) बालक के जन्मजात केशों को पहली बार विधिवत् कटवाने का संस्कार है। 'चूडा' अर्थात् शिखा (चोटी)। इस संस्कार में सिर के शेष केश कटवाकर सहस्रार-स्थान (मस्तक के मध्य) पर शिखा सुरक्षित रखी जाती है। शास्त्रों के अनुसार शिखा बिना धार्मिक कर्मों का अधिकार नहीं रहता। यह संस्कार बालक की दीर्घायु, बल, आरोग्य एवं मेधाशक्ति की कामना से किया जाता है।

मुंडन का शास्त्रीय काल

स्मृतियों एवं गृह्यसूत्रों के अनुसार —

संवत्सरे (असमाप्ते द्वादशे मासे) चूडाकर्म, त्रिषु वा संवत्सरेषु ।
पारस्कर गृह्यसूत्र — सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम् ॥
  • चूड़ाकर्म जन्म से प्रथम वर्ष (एक वर्ष की आयु में) या तीसरे वर्ष में करना मुख्य विधान है।
  • बौधायन गृह्यसूत्र २.८, पारस्कर गृह्यसूत्र २.१ तथा मनुस्मृति २.३५ में प्रथम या तृतीय वर्ष का विधान मिलता है।
  • गोभिल एवं आश्वलायन पद्धतियों में तृतीय, पञ्चम या सप्तम वर्ष को उत्तम-मध्यम-गौण काल कहा गया है; यह बालक की स्थिति एवं कुलाचार पर निर्भर करता है।
  • उपनयन के साथ भी मुंडन किया जा सकता है, किंतु शास्त्रसम्मत काल तृतीय वर्ष है।

मुहूर्त निर्णय

  • उत्तरायण काल, शुक्ल पक्ष में करना अत्यंत शुभ है।
  • शुभ वार एवं नक्षत्र — अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती।
  • शुभ लग्न — वृषभ, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, मकर, मीन।
  • जन्ममास, जन्मतिथि, जन्मनक्षत्र, माता के गर्भवती होने पर, मलमास एवं गुरु-शुक्र अस्तकाल का त्याग करें।

मुंडन का महत्व

चरक एवं सुश्रुत जैसे आयुर्वेदाचार्यों का कथन है कि केश, श्मश्रु एवं नखों के कटान-प्रसाधन से आयुष्य, पुष्टता, बल, शुचिता एवं सौंदर्य की वृद्धि होती है। जन्मजात केशों से सिर में खाज, फोड़े, जूँ आदि की संभावना रहती है; प्रथम क्षौर से शिशु के केशों का समुचित विकास होता है। आश्वलायन गृह्यसूत्र के अनुसार इससे बालक की आयुवृद्धि होती है और वह यशस्वी एवं मंगल कर्मों में प्रवृत्त होता है।

मुंडन संस्कार की सामग्री

  • रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पुष्प, दीपक, घी, कपूर,
  • फल, मिठाई, नारियल, पंचामृत, गंगाजल, कुशा,
  • क्षुर (उस्तरा)/नवीन कैंची, मौली, गाय का दूध-दही-घी।

मुंडन विधि (क्रमशः)

१. नान्दी श्राद्ध एवं संकल्प

पूर्वेद्युर् प्रातः नान्दी श्राद्ध एवं रात्रि में उदक-शांति, प्रतिसर-बंधन एवं अंकुरार्पण करने का विधान है। मुख्य दिन स्नानादि से निवृत्त होकर संकल्प करें —

मम बालकस्य आयुष्य-बल-मेधा-वृद्ध्यर्थं चूडाकर्मसंस्कारं करिष्ये ।

२. गणेश पूजन एवं हवन

गणेश स्मरण कर अग्नि-प्रतिष्ठा करें तथा 'ये केशिनः' इत्यादि मंत्रों से हवन करें:

ॐ ये केशिनो विध्यतमा इषिरास्ते प्रतिगृह्णन्तु प्रलेहिकास्ते ।
अधापरं केशिनामनु जागरहायम् ॥

३. केश-वपन (मुंडन)

उस्तरे/कैंची से बालक के केश कटवाएँ। मस्तक के मध्य (सहस्रार स्थान) की शिखा छोड़ी जाती है — यही चूड़ाकर्म का मूल तत्व है। एक, तीन या पाँच शिखाएँ कुलाचार के अनुसार रखी जा सकती हैं।

४. स्नान, वस्त्र एवं नीराजन

मुंडन के बाद बालक को स्नान कराकर नवीन वस्त्र पहनाएँ, अलंकृत करें तथा ब्राह्मणों को त्रिवृत् अन्न से सम्पूज्य पुण्याहवाचन कराएँ।

५. आरती एवं प्रसाद

कटे बाल गंगा-विसर्जन हेतु संभाल कर रखें अथवा पवित्र स्थान पर निक्षेप करें। अंत में आरती एवं प्रसाद वितरण करें।

मुंडन के विशेष नियम

  • मुंडन में शिखा अवश्य छोड़ें; शिखा-छेदन निषिद्ध है।
  • जन्ममास, जन्मतिथि एवं जन्मनक्षत्र के दिन मुंडन न करें।
  • माता के गर्भवती होने पर बालक का मुंडन नहीं कराना चाहिए (पाँच वर्ष की आयु के बाद गर्भवती माँ पर भी किया जा सकता है)।
  • मुंडन के दिन बालक को स्नान कराकर शुचि वस्त्र पहनाएँ।
  • संस्कार के उपरांत ब्राह्मण भोजन एवं दान-दक्षिणा करें।