विद्यारंभ संस्कार (अक्षराभ्यास/अक्षरारंभ) बालक-बालिकाओं के विद्या-जीवन का प्रारंभिक संस्कार है, जिसमें शिशु पहली बार पवित्र अक्षर (प्रायः 'ॐ' या 'श्री') लिखता है। दक्षिण भारत में इसे 'विद्यारंभम', केरल-कर्नाटक में 'एझुथिनिरुथु' तथा बंगाल में 'हाटे खोरी' कहा जाता है। इस संस्कार में माँ सरस्वती, भगवान गणेश एवं गुरु का पूजन किया जाता है। शास्त्रों में विद्या को परम पवित्र कहा गया है — 'विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्'।
सामान्य सरस्वती पूजा सरस्वती पूजा विधि तथा वसंत पंचमी पूजन वसंत पंचमी सरस्वती पूजा विधि पृष्ठ पर देखें।
विद्यारंभ कब करें?
- सामान्यतः 2 से 5 वर्ष की आयु में, जब बालक शिक्षा के योग्य हो।
- वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) — सर्वाधिक प्रचलित; इसे अबूझ मुहूर्त कहा गया है।
- विजयादशमी (दशहरा) — आश्विन शुक्ल दशमी विद्यारंभ हेतु अत्यंत शुभ।
- अक्षय तृतीया एवं अन्य शुभ मुहूर्त, गुरुवार।
विद्यारंभ का महत्व
यह संस्कार बालक में विद्या के प्रति उत्साह एवं सम्मान का भाव जाग्रत् करता है। अभिभावकों एवं गुरुजनों को संतान की शिक्षा-दीक्षा के पवित्र दायित्व का बोध कराता है। माँ सरस्वती की कृपा से बुद्धि तीव्र एवं स्मरणशक्ति प्रबल होने की कामना की जाती है।
विद्यारंभ पूजा की सामग्री
- सरस्वती एवं गणेश की मूर्ति/चित्र,
- चावल की थाली (अक्षर-लेखन हेतु), स्लेट-चॉक/पुस्तक, केसर-युक्त स्याही एवं लेखनी,
- शहद, स्वर्ण-सलाका (जीभ पर 'ॐ' लिखने हेतु),
- रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, कपूर,
- फल, मिठाई, नारियल, दूध, मिश्री, सफेद वस्त्र, आसन, गुरु-दक्षिणा।
विद्यारंभ विधि (क्रमशः)
१. स्नान एवं संकल्प
बालक को स्नान कराकर (वसंत पंचमी पर पीले) नवीन वस्त्र पहनाएँ। पूजा का संकल्प करें —
बालकस्य विद्यारम्भं करिष्ये ।
२. गणेश पूजन
सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान गणेश का पूजन करें —
३. सरस्वती पूजन एवं वंदना
माँ सरस्वती का पूजन सरस्वती पूजा विधि के अनुसार आवाहन-आसन-पाद्य-अर्घ्य-गंध-पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य से करें। विद्यारंभ श्लोक का उच्चारण करें —
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥
तथा — 'ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः' का जप करें।
४. लेखनी-पूजन एवं अक्षराभ्यास
लेखनी, स्लेट/पुस्तक एवं पट्टी का पूजन करें। बालक की उँगली पकड़कर चावल की थाली में 'ॐ' अथवा 'श्री' लिखवाएँ। प्रचलन में स्वर्ण-सलाका से शहद लगाकर बालक की जीभ पर 'ॐ' अंकित किया जाता है — इससे वाणी मधुर एवं मेधा प्रबल होने की कामना होती है।
५. गुरु वंदन एवं आशीर्वाद
गुरु/विद्वान् से प्रथम अक्षर का अभ्यास कराएँ, आशीर्वाद लें तथा गुरु-दक्षिणा अर्पित करें। अंत में प्रसाद वितरण करें —
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर ॥
विद्यारंभ के विशेष नियम
- विद्यारंभ शुभ मुहूर्त में ही करें — पंचांग/ज्योतिषी से पुष्टि करें।
- चावल पर लिखना अभ्यास एवं स्थायी लेखन ज्ञान-प्राप्ति का प्रतीक माना गया है।
- बालक पर कोई दबाव न डालें; इसे आनंद एवं उत्सव के भाव से करें।
- गुरुजनों का सम्मान एवं धन्यवाद आवश्यक है; विद्या का सदुपयोग का संकल्प लें।
- संस्कार के बाद प्रतिदिन हल्का लेखन-अभ्यास कराने का प्रचलन है।