नामकरण संस्कार षोडश संस्कारों में वह संस्कार है जिसमें शिशु को जन्मतिथि के अनुसार शुभ नाम प्रदान किया जाता है। शास्त्रों में नाम के महत्व पर विशेष बल दिया गया है — नाम ही व्यक्ति के स्वभाव, आचरण और कर्म का संकेतक माना गया है। यह संस्कार जन्म के दसवें, ग्यारहवें या बारहवें दिन शुभ तिथि-मुहूर्त में संपन्न किया जाता है। इस लेख में नामकरण का शास्त्रीय विधान, नक्षत्रानुसार नाम-निर्धारण, विधि और मंत्र दिए गए हैं।

नामकरण का शास्त्रीय विधान

मनुस्मृति में नामकरण का काल स्पष्ट किया गया है —

नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् ।
पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ — मनुस्मृति २.३०

अर्थात् शिशु का नामकरण दसवें या बारहवें दिन पुण्य तिथि, शुभ मुहूर्त या गुणवान् नक्षत्र में करना चाहिए। वर्तमान में प्रायः ग्यारहवें दिन का भी प्रचलन है। इसके अतिरिक्त जन्म के बाद माता-पिता शुभ दिन देखकर नाम का घोष (कान में नाम बोलना) भी करते हैं।

नक्षत्रानुसार नाम का पहला अक्षर

शास्त्रों में नाम का पहला अक्षर जन्म-नक्षत्र के अनुसार रखने का विधान है। कुछ प्रमुख नक्षत्रों के अक्षर इस प्रकार हैं —

जन्म नक्षत्रनाम का प्रथम अक्षर
अश्विनीचू, चे, चो, ला
रोहिणीओ, वा, वी, वू
मृगशिरावे, वो, का, की
आर्द्राकू, खा, गा, घा
पुनर्वसुके, को, हा, ही
पुष्यहू, हे, हो, डा
अश्लेषाडी, डू, डे, डो
मघामा, मी, मू, मे
उत्तरा फाल्गुनीते, टो, पा, पी
हस्तपू, पे, पो, षा
चित्रापे, पो, रा, री
स्वातीरू, रे, रो, ता
अनुराधाना, नी, नू, ने
श्रवणखी, खू, खे, खो
धनिष्ठागा, गी, गू, गे
शतभिषागो, सा, सी, सू
उत्तरा भाद्रपददो, च, ची, चू
रेवतीदे, दो, चा, ची

पूर्ण नक्षत्र-सूची एवं सटीक अक्षर के लिए पंचांग या ज्योतिषी का सहयोग लें, क्योंकि शाखा-पद्धति के अनुसार थोड़ा भेद हो सकता है।

नाम चुनने के नियम

  • वर्णानुसार उपनाम: मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण के नाम में 'शर्मा', क्षत्रिय के नाम में 'वर्मा' और वैश्य के नाम में 'गुप्त' जोड़ने का विधान है।
  • सम अक्षर शुभ: प्रायः सम अक्षर (दूसरा, चौथा अक्षर) से युक्त नाम अधिक शुभ माने जाते हैं।
  • अर्थपूर्ण: नाम का शुभ अर्थ हो और देवताओं के नाम, शुभ गुणों का बोधक हो।
  • उच्चारण सरल: नाम सरल, मधुर एवं स्पष्ट उच्चारण वाला हो।
  • दो नाम: परंपरा में एक गोपनीय नाम (जन्म के समय) और एक लौकिक नाम (नामकरण के समय) रखने का प्रचलन है।

नामकरण संस्कार की सामग्री

  • रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पुष्प, दीपक, घी, कपूर,
  • फल, मिठाई, नारियल, पंचामृत, गंगाजल,
  • स्वर्ण या चांदी की छड़ी, शहद, देव प्रतिमा, मौली।

नामकरण विधि (क्रमशः)

१. स्नान एवं संकल्प

शिशु को स्नान कराकर नवीन वस्त्र पहनाएँ। शुभ मुहूर्त में पूजा स्थल पर देव प्रतिमा स्थापित कर परिवार के मुखिया द्वारा संकल्प किया जाता है —

मम सुतस्य जातकर्माद्यपवर्ग-प्राप्त्यर्थं नामकरणसंस्कारं करिष्ये।

२. गणेश व नवग्रह पूजन

विघ्नविनाश के लिए सर्वप्रथम श्रीगणेश का पूजन करें —

ॐ गं गणपतये नमः ।

३. नामोच्चारण (घोष)

पूजा-उपचार के बाद शिशु को गोद में लेकर पिता शिशु के दाहिने कान में चुना हुआ नाम बोलते हैं, माता उसे दुहराती हैं और पुरोहित आशीर्वाद देते हैं। प्रचलन में यह क्रिया माता-पिता और पुरोहित के सान्निध्य में की जाती है।

४. जीभ पर 'ॐ' अंकन

शास्त्रीय परंपरा में स्वर्ण छड़ी से शहद में डुबोकर शिशु की जीभ पर 'ॐ' या चुने गए अक्षर का अंकन कराया जाता है, जिससे वाणी मधुर और मंगलमयी होने की कामना की जाती है।

५. आरती एवं प्रसाद

अंत में देव-प्रतिमा की आरती कर प्रसाद वितरण करें तथा बड़ों का आशीर्वाद लें।

नामकरण के विशेष नियम

  • नामकरण जन्म के १०-१२ दिनों के भीतर शुभ मुहूर्त में करें; आवश्यक होने पर एक मास तक की छूट प्रचलित है।
  • नाम जन्म-नक्षत्र के अक्षर से तथा सार्थक अर्थ वाला रखें।
  • माता-पिता का व्रत या संयम (सात्त्विक भोजन) इस दिन रखा जाए।
  • संस्कार के दिन दान-दक्षिणा एवं ब्राह्मण भोजन का विधान है।