अन्नप्राशन संस्कार शिशु के जीवन का वह संस्कार है जिसमें उसे पहली बार ठोस अन्न ग्रहण कराया जाता है। 'अन्न' अर्थात् भोजन और 'प्राशन' अर्थात् ग्रहण करना। गृह्यसूत्रों एवं स्मृतियों में इसका विशेष विधान मिलता है। शिशु के दाँत निकलने तक उसे केवल माँ का दूध ही उचित है; अन्नप्राशन का सही काल और विधि जानकर ही यह संस्कार संपन्न करना चाहिए।
अन्नप्राशन का शास्त्रीय काल
मनुस्मृति तथा आश्वलायन गृह्यसूत्र के अनुसार —
तथा पराशरस्मृतौ — पञ्चमे मासि पुत्राणां सप्तमे वा प्रकल्पयेत् ॥
सामान्य विधान यह है —
- बालक (पुत्र): सम मास में — छठे, आठवें, दसवें या बारहवें मास में। (मनुस्मृति २.३४, आश्वलायन गृह्यसूत्र १.१५)
- बालिका (कन्या): विषम मास में — पाँचवें, सातवें, नवें या ग्यारहवें मास में।
- कश्यप संहिता के अनुसार दाँत निकलने तक फलप्राशन एवं दसवें मास से ठोस अन्न (प्रायः षष्टिक चावल की खीर) का विधान है।
शुभ तिथि, नक्षत्र एवं वार
- शुभ तिथियाँ: द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी (शुक्ल एवं कृष्ण दोनों पक्ष) तथा पूर्णिमा।
- शुभ नक्षत्र: रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती।
- शुभ वार: सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार।
- जन्ममास, जन्मतिथि, जन्मनक्षत्र तथा जन्म के दिन को त्यागकर ही मुहूर्त रखें।
अन्नप्राशन की सामग्री
- रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पुष्प, दीपक, घी, कपूर,
- फल, मिठाई, नारियल, पंचामृत, गंगाजल, देव प्रतिमा,
- स्वर्ण की अंगूठी (शलाका), खीर (षष्टिक चावल से बनी), चांदी का पात्र।
अन्नप्राशन विधि (क्रमशः)
१. स्नान, वस्त्र एवं संकल्प
शिशु को स्नान कराकर नवीन वस्त्र पहनाएँ। शुभ मुहूर्त में देव-स्थापना कर पिता/मुखिया संकल्प करें —
२. गणेश व नवग्रह पूजन
३. अन्न की स्थापना एवं अभिमंत्रण
खीर को चांदी के पात्र में रखकर अभिमंत्रित करें —
इत्यनुसन्धाय देवेभ्यः प्रीतये इदं अन्नं समर्पयामि ।
४. अन्नप्राशन
स्वर्ण की अंगूठी से खीर लेकर शिशु को मधुर वाणी से 'मीठा खिलाया' जाता है। प्रथम ग्रास शुभ एवं मधुर होना आवश्यक है।
५. आरती एवं प्रसाद
अंत में आरती कर प्रसाद वितरण करें एवं बड़ों से आशीर्वाद लें।
अन्नप्राशन के विशेष नियम
- अन्नप्राशन निर्धारित मास (पुत्र-सम मास, कन्या-विषम मास) में ही करें।
- पहला अन्न सदैव मधुर (खीर) होना चाहिए — लवण नहीं।
- स्वर्ण की अंगूठी से खिलाने का विधान है।
- संस्कार के दिन शिशु का पेट हल्का रखें; दूध एवं अन्न का अंतर रखें।
- दाँत निकलने के बाद भी यदि संस्कार न हो पाए तो शुभ मुहूर्त में अगले उपयुक्त मास में करें।