कर्णवेध संस्कार षोडश संस्कारों में नौवाँ संस्कार है, जिसमें बालक-बालिका के कान (एवं कन्या के बायें नासिका-छिद्र) का विधिवत् वेध किया जाता है। कात्यायन एवं अन्य सूत्रकारों ने इसका काल जन्म से तृतीय या पञ्चम वर्ष बताया है — 'कर्णवेधो वर्षे तृतीये पञ्चमे वा'। कर्णवेध केवल सौंदर्य नहीं, स्वास्थ्य-रक्षा एवं आभूषण-धारण की दृष्टि से भी विधान किया गया है।
कर्णवेध का शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक महत्व
- सुश्रुत संहिता (सूत्र स्थान) के अनुसार — रोग-रक्षा तथा आभूषण हेतु बालक के कानों का वेधन करना चाहिए। चिकित्सा स्थान में कहा गया है कि कान-छेदन से अंत्रवृद्धि (इनग्वाइनल हर्निया) की संभावना नहीं रहती।
- कर्णवेध रहित पुरुष को शास्त्रों में श्राद्ध-कर्म का अधिकारी नहीं माना गया।
- मान्यता है कि सूर्य की किरणें कर्ण-छिद्र से प्रवेश कर बालक को तेजस्वी एवं स्वस्थ बनाती हैं।
- स्वर्ण कुंडल से मस्तिष्क के दोनों भाग विद्युत-संचार की दृष्टि से सक्रिय रहते हैं; कन्याओं में स्वर्ण आभूषण से मासिक-धर्म नियमित रहने की मान्यता है।
- आधुनिक एक्यूप्रेशर की दृष्टि से कर्ण-लोब पर दबाव तनाव में कमी लाता है।
कर्णवेध की आयु एवं मुहूर्त
- उत्तम काल: तृतीय या पञ्चम वर्ष (कात्यायन सूत्र)।
- प्रचलन में जन्म के छठे, सातवें, आठवें माह अथवा दसवें, बारहवें, सोलहवें दिन भी किया जाता है।
- शीतकाल (कार्तिक, पौष, माघ, फाल्गुन, चैत्र) के मास उपयुक्त माने गए हैं — ग्रीष्म में घाव जल्दी नहीं भरता।
- शुभ वार — सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार।
- शुभ नक्षत्र — मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, पुनर्वसु।
सुई का वर्णानुसार विधान
मनुस्मृति एवं धर्मसूत्रों के अनुसार वेध की सुई वर्णानुसार निर्धारित है —
| वर्ण | सुई |
|---|---|
| ब्राह्मण | चांदी की सुई |
| क्षत्रिय | स्वर्ण की सुई |
| वैश्य | चांदी की सुई |
| शूद्र | लोहे की सुई |
साही के काँटे से वेध भी द्विजों के लिए मान्य है। जो लोग किसी कारण शास्त्रीय सुई की व्यवस्था नहीं कर सकते, वे शुद्ध स्टील/स्वर्ण की निष्फल सुई से विद्वान् वैद्य द्वारा वेध करवा सकते हैं, किंतु कर्ण-लोब की नाड़ी-संधि (नुकीले किनारे के मध्य) से बचते हुए ही वेध होना चाहिए।
कर्णवेध की सामग्री
- रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पुष्प, दीपक, घी, कपूर,
- स्वर्ण/चांदी की सुई, स्वर्ण कुंडल, नवीन शलाका (छिद्र खुले रखने हेतु),
- फल, मिठाई, नारियल, गंगाजल, औषधि (घाव के लिए)।
कर्णवेध विधि (क्रमशः)
१. स्नान एवं संकल्प
बालक को प्रातः शुद्ध जल से स्नान कराकर वस्त्र-अलंकरण पहनाएँ। पूजा-स्थान में संकल्प करें —
२. देव पूजन
शुभ समय में पवित्र स्थान पर देवताओं का पूजन कर सूर्य के सम्मुख बैठकर कान का अभिमंत्रण करें —
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥ — ऋग्वेद १.८९.८
३. वेध का क्रम
- बालक: पहले दाहिने कान का, तत्पश्चात् बाएँ कान का वेध।
- बालिका: पहले बाएँ कान का, तत्पश्चात् दाहिने कान का वेध; साथ ही बाएँ नासिका-छिद्र में भी छिद्र कर स्वर्ण आभूषण धारण कराने का विधान है।
द्वितीय (वाम) कर्ण के वेध हेतु मंत्र —
योषैव शिङ्क्ते वितताधि धन्वन् ज्या इव समने पारयन्ती ॥
४. छिद्र-पूरण एवं कुंडल
वेध के पश्चात् छिद्र बंद न हो जाए, इसलिए शलाका स्थापित कर उचित औषधि लगाएँ। छिद्र भर जाने पर स्वर्ण कुंडल धारण कराएँ।
५. आरती एवं प्रसाद
अंत में आरती कर प्रसाद वितरण करें एवं दक्षिणा-दान का विधान है।
कर्णवेध के विशेष नियम
- वेध विद्वान् वैद्य/अनुभवी व्यक्ति से ही करवाएँ ताकि नाड़ी को क्षति न पहुँचे।
- घाव सूखने तक जल-संपर्क कम रखें एवं साफ-सुथरा रखें; संक्रमण रोकने हेतु उचित औषधि लगाएँ।
- छिद्र में स्वर्ण आभूषण धारण कराना श्रेष्ठ है।
- मुख्य द्वार/चौराहे से दूर पवित्र स्थान में संस्कार करें।