अंत्येष्टि संस्कार (अंतिम संस्कार/दाह संस्कार) षोडश संस्कारों का अंतिम संस्कार है। 'अन्त्य' अर्थात् अंतिम, 'इष्टि' अर्थात् यज्ञ — अर्थात् अंतिम यज्ञ, जिसे 'नरयाग' भी कहा जाता है। शरीर पंचतत्वों (क्षिति, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है; अंत्येष्टि में इन पंचतत्वों को पुनः प्रकृति में विलीन किया जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार शास्त्रसम्मत विधि से संपन्न अंत्येष्टि से ही आत्मा को सद्गति प्राप्त होती है।
ध्यान दें: यह संस्कार अत्यंत गंभीर एवं श्रद्धा-पूर्ण है। मृत्यु पर शोक-संयम रखते हुए परिवार के साथ अनुभवी पुरोहित के निर्देशन में ही यह संपन्न करना चाहिए।
दाह का काल
- मृत्यु के पश्चात् यथाशीघ्र (प्रायः उसी दिन) दाह संस्कार करें; प्रतीक्षा यथासंभव कम रखें।
- दिन में दाह संस्कार करना उत्तम है; रात्रि में मृत्यु होने पर प्रातः दाह का विधान है।
- संभव हो तो पुत्र/निकटतम संबंधी की प्रतीक्षा करें।
अंत्येष्टि की सामग्री
- गंगाजल, पंचामृत, तिल, जौ, कुशा,
- चंदन, अक्षत, पुष्प, कपूर, घी, शुद्ध वस्त्र,
- लकड़ी (आम, शमी, वट, गूलर — यथासंभव चंदन), दाहित वस्त्र, छिद्रयुक्त घड़ा (मटका),
- अग्नि (गृह से निजी रूप से प्रज्वलित), दक्षिणा-पात्र।
अंत्येष्टि विधि (क्रमशः)
१. शव-सज्जा
मृतक को भूमि पर (दक्षिण दिशा में सिर करके) लिटाएँ। शव को स्नान कराकर (गंगाजल/पंचामृत से) नया शुभ्र वस्त्र पहनाएँ — नग्न शव का दाह निषिद्ध है। माथे पर चंदन-तिलक, मुख में तुलसी-पत्र एवं गंगाजल दें।
२. पिण्डदान (प्रथम)
पहला पिंड घर में ही दिया जाता है — चावल, जौ, तिल एवं आटे के मिश्रण से। मृतक के उद्देश्य से दाह-संस्कार का संकल्प करें।
३. शवयात्रा
'राम नाम सत्य है' अथवा 'ॐ नमः शिवाय' का उच्चारण करते हुए शव को श्मशान ले जाएँ। निकटतम संबंधी कंधा देते हैं। मार्ग में शव को भूमि पर न रखें।
४. चिता-स्थापन
श्मशान में चिता-वेदी बनाकर पवित्र जल छिड़कें एवं गोबर से लीपें। शव को चिता पर उत्तर दिशा में सिर करके रखें। चारों दिशाओं में चार बड़ी समिधाएँ स्थापित करें।
५. चिता-परिक्रमा एवं घट-भंग
कर्ता (ज्येष्ठ पुत्र/निकटतम) छिद्रयुक्त घड़े में जल लेकर मंत्रोच्चारण के साथ चिता की तीन परिक्रमा करता है —
मृत्युकालवशं प्राप्तं नरं पंचत्वमागतम् ॥
परिक्रमा के पश्चात् घड़ा पीछे की ओर गिराकर फोड़ दें।
६. मुखाग्नि
कर्ता मुख की ओर से (मस्तक दिशा से) चिता को अग्नि प्रदान करता है। घी, कपूर आदि से अग्नि को प्रदीप्त करें। यहाँ प्रेत (मृतक) के नाम से घी की आहुति दी जाती है —
असौ (प्रेत-नाम) प्रेताय स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ॥
७. अस्थि-संचय एवं विसर्जन
दाह के तृतीय/चतुर्थ दिन अस्थि-संचय ('फूल चुनना') करें। अस्थियों को दस दिनों के भीतर गंगा अथवा पवित्र नदी में विसर्जित करें (तीर्थ-विसर्जन हो तो तीर्थ-श्राद्ध सहित)।
८. शुद्धि एवं श्राद्ध
दशम (दसवें) दिन घर की शुद्धि, पिंडदान एवं दश-गात्र श्राद्ध किया जाता है। त्रयोदश (तेरहवें) दिन सपिंडीकरण/एकोद्दिष्ट श्राद्ध तथा निधन-शांति कर मीठा भोजन का विधान है।
विशेष प्रावधान
- पाँच वर्ष से कम आयु के बालक, साधु-संत एवं विशेष परिस्थितियों में अग्नि-दाह के स्थान पर भूमि-निक्षेप (दफ़न) का विधान है।
- गर्भस्थ/नवजात शिशु का जल-प्रवाह (नदी में) भी प्रचलित है।
- कपाल-क्रिया (मस्तक फूटने) के पश्चात् ही श्मशान से प्रस्थान करें।
अंत्येष्टि के विशेष नियम
- दाह-अग्नि गृह से ही ले जाएँ; किसी से अग्नि न लें।
- कर्ता तीन दिन (सूतक) तक संयम, नियमित स्नान एवं सात्त्विक भोजन रखता है।
- संस्कार में शोक-संयम रखें; विलाप न करें।
- श्राद्ध-तर्पण, पिंडदान एवं ब्राह्मण-भोजन (दान) का विधान है।
- मृतक के निमित्त दशदान (गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, वस्त्र आदि दस दान) करने की परंपरा है।