वरलक्ष्मी व्रत दक्षिण भारत में विशेष रूप से प्रचलित पर्व है। यह श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को मनाया जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है और वरलक्ष्मी की कलश-स्थापना कर अष्टोत्तरी-पूजा का प्रचलन है। इस लेख में वरलक्ष्मी पूजा की विधि, कलश-स्थापना, मंत्र और नियम दिए गए हैं।

सामान्य लक्ष्मी पूजा लक्ष्मी पूजा विधि पृष्ठ पर देखें।

वरलक्ष्मी व्रत का महत्व

वरलक्ष्मी व्रत में माँ लक्ष्मी को वर देने वाली लक्ष्मी — वरलक्ष्मी — के रूप में पूजा जाता है। परंपरा के अनुसार यह व्रत स्त्रियाँ परिवार की समृद्धि और सुख की कामना से रखती हैं। इस दिन कलश-स्थापना कर माँ लक्ष्मी की विशेष पूजा और पारायण होता है। दक्षिण भारत में यह पर्व विशेष रूप से प्रचलित है।

वरलक्ष्मी पूजा कब करें?

वरलक्ष्मी व्रत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को मनाया जाता है — प्रायः श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से पहले आने वाला शुक्रवार। सटीक तिथि के लिए पंचांग देखें।

वरलक्ष्मी पूजा की सामग्री

  • कलश (मिट्टी/ताँबा), मौली, आम के पत्ते, नारियल,
  • लक्ष्मी की मूर्ति/चित्र,
  • रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पुष्प (कमल विशेष),
  • धूप, दीप, कपूर, घंटी,
  • नैवेद्य — खीर, हलवा, फल, मिश्री, नारियल,
  • वस्त्र, आभूषण-सामग्री (श्रृंगार हेतु, क्षेत्रीय), आसन।

वरलक्ष्मी पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — स्नान एवं संकल्प

प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत-पूजन का संकल्प करें:

मम उपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा श्रीवरलक्ष्मीप्रीत्यर्थं
वरलक्ष्मीव्रतपूजनं करिष्ये।

चरण 2 — कलश-स्थापना

पूजा स्थल पर कलश स्थापित करें — कलश में जल भरकर मौली लपेटें, आम के पत्ते लगाएँ और नारियल रखें। यह कलश माँ वरलक्ष्मी की प्रतिष्ठा का स्थान माना जाता है।

चरण 3 — लक्ष्मी का पूजन

कलश के समक्ष माँ लक्ष्मी की पूजा करें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य। प्रचलित प्रारूप:

ॐ श्रीं वरलक्ष्म्यै नमः [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।

चरण 4 — लक्ष्मी मंत्र जप

ॐ श्रीं लक्ष्म्यै नमः।
ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुपत्न्यै धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥

चरण 5 — चालीसा पाठ एवं आरती

लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें और आरती — ॐ जय लक्ष्मी माता — करें। अंत में क्षमा-प्रार्थना:

आवाहनं न जानामि न जानामि तथार्चनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥

वरलक्ष्मी पूजा के नियम

  • व्रत स्वास्थ्य के अनुसार रखें — पूर्ण उपवास या फलाहार, जैसा उचित लगे।
  • वरलक्ष्मी पूजन में कलश-स्थापना का विशेष महत्व है।
  • पूजा में सात्विक नैवेद्य और स्वच्छता का ध्यान रखें।
  • दक्षिण भारत की पद्धति में अष्टोत्तरी-पूजा और विशेष पारायण प्रचलित है — क्षेत्रीय रीति का सम्मान करें।

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