धनतेरस (धनत्रयोदशी) कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता है। इसी दिन परंपरा के अनुसार धन्वंतरि जयंती होती है और धन-वैभव की देवी माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। नई वस्तु/बर्तन खरीदने का भी इस दिन विशेष प्रचलन है। इस लेख में धनतेरस की लक्ष्मी पूजा विधि, सामग्री, मंत्र और नियम दिए गए हैं।
सामान्य लक्ष्मी पूजा लक्ष्मी पूजा विधि और अगले दिन की लक्ष्मी पूजा दीपावली लक्ष्मी पूजा विधि पृष्ठ पर देखें।
धनतेरस का महत्व
धनतेरस को धन-संपदा का पर्व माना गया है। परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र-मंथन से अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे, इसलिए यह दिन धन्वंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इसी दिन से दीपावली के त्योहार की शुरुआत मानी जाती है और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।
धनतेरस लक्ष्मी पूजा कब करें?
धनतेरस कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता है। लक्ष्मी पूजा संध्या (प्रदोष) काल में की जाती है — सटीक मुहूर्त पंचांग देखें।
धनतेरस लक्ष्मी पूजा की सामग्री
- लक्ष्मी की मूर्ति/चित्र और कलश,
- रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पुष्प,
- धूप, दीप, कपूर, घंटी,
- नैवेद्य — मिठाई, फल, नारियल, खीर,
- सिक्के, अनाज, मौली, आसन।
धनतेरस लक्ष्मी पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — स्नान एवं संकल्प
स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा का संकल्प करें:
धनतेरसपूजनं करिष्ये।
चरण 2 — धन्वंतरि एवं लक्ष्मी का पूजन
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी दोनों का पूजन होता है। प्रचलित प्रारूप:
ॐ श्रीं लक्ष्म्यै नमः [उपचार] समर्पयामि।
नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।
चरण 3 — लक्ष्मी मंत्र जप
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
चरण 4 — चालीसा पाठ एवं आरती
लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें और आरती — ॐ जय लक्ष्मी माता — करें। अंत में क्षमा-प्रार्थना:
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥
धनतेरस के नियम
- धनतेरस पर नई वस्तु/बर्तन खरीदने का प्रचलन है — यह शुभता का प्रतीक माना जाता है।
- पूजा में स्वच्छता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।
- इस दिन घर में दीप जलाने का भी प्रचलन है।
- मुहूर्त के अनुसार संध्या में पूजा करें — पंचांग देखें।