भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के आदि-आचार्य और भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। इन्हें आरोग्य के देवता भी कहा जाता है। इस लेख में धन्वंतरि जी पूजा की संपूर्ण विधि, सामग्री, मंत्र, धन्वंतरि जयंती (धनतेरस) पूजन और नियम की जानकारी सरल भाषा में दी गई है।
भगवान धन्वंतरि का महत्व
परंपरा के अनुसार धन्वंतरि समुद्र मंथन के समय अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे और उन्होंने मनुष्यों को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। इन्हें विष्णु का चिकित्सक स्वरूप माना गया है। धन्वंतरि जयंती (धनतेरस — कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी) के दिन विशेष पूजन होता है, और इन्हें आरोग्य तथा दीर्घायु का देवता माना जाता है। मान्यता है कि धन्वंतरि जी की पूजा से आरोग्य, रोग-निवारण और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
भगवान धन्वंतरि पूजा कब करें?
- धनतेरस (धन्वंतरि जयंती): कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाई जाती है।
- सायंकाल: इस दिन की पूजा प्रदोष/सायंकाल में की जाती है।
- मासिक त्रयोदशी: प्रत्येक माह की त्रयोदशी को धन्वंतरि स्मरण शुभ माना गया है।
भगवान धन्वंतरि पूजा की सामग्री
- धन्वंतरि जी की प्रतिमा/चित्र, पीला वस्त्र,
- अमृत कलश (जल से भरा पीतल/तांबे का लोटा),
- तुलसी दल, पुष्प, चंदन, कुमकुम, अक्षत,
- घी का दीपक, धूप, कपूर,
- नैवेद्य: मिठाई, फल, खीर,
- दीपदान हेतु घी के दीप।
भगवान धन्वंतरि पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — स्नान एवं संकल्प
धनतेरस के दिन स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करें और धन्वंतरि प्रतिमा/चित्र को चौकी पर स्थापित करें। पूजा का संकल्प लें:
चरण 2 — अमृत कलश स्थापना एवं पूजन
धन्वंतरि जी का प्रतीक अमृत कलश होता है — जल से भरा पीतल/तांबे का लोटा प्रतिमा के समीप स्थापित करें। प्रतिमा पर चंदन का तिलक लगाएँ, तुलसी दल-पुष्प-अक्षत अर्पित करें और धूप-दीप दिखाएँ। उपचार-अर्पण के समय मंत्र का जाप करें:
नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देव को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम मंत्र में [उपचार] के स्थान पर बोलें।
चरण 3 — धन्वंतरि महामंत्र का जाप
पूजन के बाद धन्वंतरि महामंत्र का कम से कम 108 बार जप करें — यह आरोग्य और रोग-निवारण का प्रमुख मंत्र माना गया है:
चरण 4 — दीपदान एवं आरती
पूजन के बाद घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाएँ और धन्वंतरि जी की आरती करें। नैवेद्य अर्पित कर प्रसाद वितरण करें। धनतेरस के दिन किसी को भी खाली हाथ न लौटाएँ — यह परंपरा इस दिन विशेष मानी गई है।
भगवान धन्वंतरि पूजा के नियम
- धन्वंतरि पूजा प्रदोष/सायंकाल में करना शुभ माना गया है।
- पूजा में सात्विक नैवेद्य ही चढ़ाएँ; मांस-मदिरा वर्जित है।
- धनतेरस पर नई बर्तन-सामग्री खरीदने की परंपरा है, परंतु दान-पुण्य को प्राथमिकता दें।
- अमृत कलश का जल पूजा के बाद घर में छिड़काव करना शुभ माना गया है।
- आरोग्य की कामना के लिए नियमित धन्वंतरि मंत्र का जप करें।
- दीपदान के बिना धनतेरस की पूजा अधूरी मानी गई है।