वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष (बरगद) की परिक्रमा कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। इस लेख में वट सावित्री पूजा की विधि, सामग्री, मंत्र, व्रत और नियम की जानकारी सरल भाषा में दी गई है।
वट सावित्री व्रत का महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज के बंधन से मुक्त कराया था। इस घटना की स्मृति में वट सावित्री व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने वाली सुहागिन महिलाओं को पति की दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वट वृक्ष को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है।
वट सावित्री पूजा कब करें?
- व्रत तिथि: ज्येष्ठ मास की अमावस्या।
- पूजा काल: प्रातःकाल से मध्याह्न तक।
वट सावित्री पूजा की सामग्री
- रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन,
- पुष्प, दीपक, कपूर, घी,
- फल, मिठाई, नारियल, गेहूं,
- सावित्री-सत्यवान की तस्वीर, जलपात्र,
- सूत/धागा (परिक्रमा के समय लपेटने के लिए)।
वट सावित्री पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — स्नान एवं संकल्प
प्रातः स्नान कर सावित्री-सत्यवान का ध्यान करें। व्रत एवं पूजा का संकल्प करें।
चरण 2 — गणेश स्मरण
चरण 3 — वट वृक्ष का पूजन
वट वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएं तथा सावित्री-सत्यवान की तस्वीर का पूजन करते हुए उपचार-अर्पण करें:
नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।
चरण 4 — वट वृक्ष की परिक्रमा
वट वृक्ष की सूत बांधकर सात बार परिक्रमा करें। परिक्रमा के समय पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करें। इसके बाद आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
वट सावित्री व्रत के नियम
- वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा विशेष रूप से किया जाता है।
- इस दिन सुहागिनें पूरे दिन संयम से रहती हैं।
- वट वृक्ष की परिक्रमा करने का विशेष महत्व है।
- पूजा के बाद प्रसाद वितरण करें।