अमावस्या व्रत हर माह की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। यह तिथि पितरों के तर्पण और दान के लिए विशेष मानी जाती है। इस लेख में अमावस्या पूजा की विधि, सामग्री, मंत्र, व्रत और नियम की जानकारी सरल भाषा में दी गई है।

अमावस्या व्रत का महत्व

अमावस्या को पितृ तिथि माना गया है। मान्यता है कि अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध, तर्पण और दान करने से पितरों को तृप्ति मिलती है तथा परिवार में शांति बनी रहती है। विशेष अमावस्या (जैसे पितृ पक्ष की महालय अमावस्या और दीपावली की लक्ष्मी पूजन वाली अमावस्या) का फल और भी अधिक माना जाता है।

अमावस्या पूजा कब करें?

  • अमावस्या तिथि: प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि।
  • पूजा काल: प्रातः स्नान-तर्पण तथा संध्या पूजन।

अमावस्या पूजा की सामग्री

  • रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन,
  • पुष्प, दीपक, कपूर, घी,
  • फल, मिठाई, तिल, जौ,
  • गंगाजल, कुशा, काले तिल (तर्पण के लिए),
  • देवता की मूर्ति/तस्वीर।

अमावस्या पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — स्नान एवं संकल्प

प्रातः स्नान कर पितरों को नमन करें। व्रत एवं पूजा का संकल्प करें।

ॐ विष्णवे नमः संकल्पमहं करिष्ये।

चरण 2 — गणेश स्मरण

ॐ गं गणपतये नमः।

चरण 3 — पितरों का तर्पण

कुशा और जल से पितरों का तर्पण करें। संभव हो तो श्राद्ध या दान (अन्न, तिल, वस्त्र) करें।

चरण 4 — इष्ट देव का पूजन

अपने इष्ट देव का पूजन करते हुए उपचार-अर्पण करें:

ॐ नमः [इष्ट देवता] [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।

अमावस्या व्रत के नियम

  • अमावस्या के दिन संयम से रहकर पितरों का स्मरण करें।
  • इस दिन तिल, अन्न और दान का विशेष महत्व है।
  • संभव हो तो नदी या घर पर तर्पण करें।
  • पूजा के बाद प्रसाद और दान का वितरण करें।