पूर्णिमा व्रत हर माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। पूर्णिमा तिथि सूर्य, चंद्रमा और शुभ कार्यों के लिए विशेष मानी जाती है। इस लेख में पूर्णिमा पूजा की विधि, सामग्री, मंत्र, व्रत और नियम की जानकारी सरल भाषा में दी गई है।
पूर्णिमा व्रत का महत्व
हिंदू कैलेंडर में प्रत्येक मास की पूर्णिमा का अपना महत्व है, परंतु सभी पूर्णिमा पर स्नान, दान और पूजन का विशेष फल माना गया है। मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन चंद्रमा के पूर्ण तेज के कारण व्रत और पूजन से मन की शांति तथा सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। विशेष पूर्णिमा (जैसे कार्तिक पूर्णिमा) पर स्नान-दान का फल अत्यधिक माना जाता है।
पूर्णिमा पूजा कब करें?
- पूर्णिमा तिथि: प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि।
- पूजा काल: प्रातः स्नान-पूजन तथा संध्या चंद्र दर्शन।
पूर्णिमा पूजा की सामग्री
- रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन,
- पुष्प, दीपक, कपूर, घी,
- फल, मिठाई, नारियल, पंचामृत,
- गंगाजल, सूत या साबूदाना (व्रत के लिए),
- देवता की मूर्ति/तस्वीर तथा चंद्र देव की प्रतीक मूर्ति।
पूर्णिमा पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — स्नान एवं संकल्प
प्रातः स्नान कर चंद्र देव एवं इष्ट देव का ध्यान करें। व्रत एवं पूजा का संकल्प करें।
चरण 2 — गणेश स्मरण
चरण 3 — इष्ट देव का पूजन
अपने इष्ट देव (भगवान विष्णु, शिव या माता) का पूजन करते हुए उपचार-अर्पण करें:
नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।
चरण 4 — चंद्र देव का दर्शन
संध्या के समय चंद्र देव का दर्शन कर अर्घ्य दें। इसके बाद पूजा-पाठ करें और आरती करके प्रसाद वितरण करें।
पूर्णिमा व्रत के नियम
- पूर्णिमा के दिन व्रत रखने का विशेष महत्व है।
- इस दिन अन्न का सेवन एक बार फलाहार के रूप में करें।
- चंद्र देव को जल और दूध का अर्घ्य अवश्य दें।
- पूजा के बाद दान और प्रसाद वितरण करें।