कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण किया था। इस लेख में कार्तिक पूर्णिमा पूजा की संपूर्ण विधि, सामग्री, मंत्र, स्नान और दान-विधान बताए गए हैं।
कार्तिक पूर्णिमा का महत्व
कार्तिक पूर्णिमा सनातन धर्म के सबसे पवित्र दिनों में से एक है। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान और व्रत का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण कर देवताओं की रक्षा की थी। इसके साथ ही भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया, इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान और पूजा करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।
कार्तिक पूर्णिमा कब मनाई जाती है?
- कार्तिक पूर्णिमा: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि।
- पूजा समय: प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान, दिन भर पूजन और संध्या/रात्रि में दीपदान एवं जागरण।
कार्तिक पूर्णिमा पूजा की सामग्री
- गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, मिश्री (पंचामृत हेतु),
- रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, पीले पुष्प, तुलसी दल,
- दीपक, घी, कपूर, धूप,
- फल, मिठाई (नैवेद्य), मूंग, तिल, जौ, गुड़,
- दान हेतु अन्न, वस्त्र, दक्षिणा।
कार्तिक पूर्णिमा पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — पवित्र स्नान
कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा, यमुना या किसी पवित्र नदी में स्नान करें। संभव न हो तो घर पर गंगाजल मिले जल से स्नान करें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
चरण 2 — संकल्प
पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करके पूर्व दिशा की ओर मुख करके व्रत-पूजन का संकल्प लें:
चरण 3 — गणेश पूजन
पूजा के आरंभ में भगवान गणेश का पूजन करें:
चरण 4 — भगवान विष्णु का पूजन
एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। पंचोपचार विधि से पूजन करते हुए पंचामृत, चंदन, पीले पुष्प, तुलसी दल और नैवेद्य अर्पित करें:
नोट: [उपचार] के स्थान पर उस समय अर्पित की जा रही वस्तु का नाम बोलें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि।
चरण 5 — माता लक्ष्मी का पूजन
माता लक्ष्मी को कुमकुम, अक्षत, पुष्प और श्रृंगार की वस्तुएँ अर्पित करें:
चरण 6 — कृतिकाओं का पूजन
कार्तिक पूर्णिमा पर छह कृतिकाओं (अग्नि देव की पत्नियों) की पूजा का विधान है, जिनकी स्मृति में कार्तिकेय का जन्म हुआ। श्रद्धा अनुसार कृतिकाओं के नाम से छह दीपक जलाकर पूजन करें।
चरण 7 — दीपदान एवं हवन
संध्या काल में घर और मंदिर में दीपदान करें। संभव हो तो हवन करें और उसमें घी, तिल, जौ एवं मूंग की आहुति दें। रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करना शुभ माना गया है। विष्णु सहस्रनाम या सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ भी इस दिन फलदायी होता है।
चरण 8 — दान एवं प्रसाद
कार्तिक पूर्णिमा पर दान का विशेष महत्व है। गाय, बैल, घी, अन्न, वस्त्र, कंबल और दक्षिणा दान करें। पूजा के बाद मिठाई का प्रसाद वितरण करें।
कार्तिक पूर्णिमा पूजा के नियम
- पूर्णिमा के दिन व्रत रखें, संभव न हो तो एक समय सात्विक भोजन करें।
- तामसिक भोजन और लहसुन-प्याज का सेवन वर्जित है।
- कार्तिक मास में गंगा स्नान और दीपदान विशेष फलदायी है।
- दीपदान के बाद दीपक स्वतः बुझने दें।
- भगवान विष्णु को तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।