सिद्ध कुंजिका स्तोत्र — चंडी पाठ का सार

जिस प्रकार एक छोटी सी कुंजी विशाल दरवाजे का ताला खोल देती है, उसी प्रकार सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को चंडी पाठ की सार-संपूर्ण कुंजी माना गया है। कुंजिका का अर्थ ही है कुंजी, और सिद्ध कुंजिका अर्थात वह कुंजी जो साधना को सिद्ध कर दे। परंपरा में कहा गया है कि दुर्गा सप्तशती के सात सौ श्लोकों का जो सार है, वही इस स्तोत्र में संक्षेप में समा गया है। यही कारण है कि इसे संपूर्ण चंडी पाठ का मूल मानकर आदर दिया जाता है।

सिद्ध कुंजिका क्या है

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र उन साधकों के लिए अत्यंत प्रिय है, जो चंडी पाठ की उपासना करते हैं। यह किसी एक विशेष अध्याय का श्लोक नहीं है, बल्कि समस्त अध्यायों के भावों का संक्षिप्त रूप है। जिस साधक के पास पूर्ण सप्तशती का समय नहीं होता, वह परंपरा के अनुसार सिद्ध कुंजिका का पाठ करता है और इसे ही पूर्ण पाठ का प्रतिनिधि माना जाता है। सरल शब्दों में यह चंडी पाठ का सारतत्त्व है।

महत्व

परंपरा में इसका महत्व इसी से समझा जा सकता है कि नवरात्रि के दौरान संपूर्ण सप्तशती पाठ से पहले सिद्ध कुंजिका पढ़ी जाती है। माना जाता है कि इसके बिना चंडी पाठ पूर्ण फल नहीं देता, क्योंकि कुंजिका ही पाठ की सुरक्षा और सिद्धि का आधार है। जो साधक दीर्घ पाठ अथवा मौन जप में असमर्थ हैं, उनके लिए यह स्तोत्र वरदान के समान है। यही इसका सबसे बड़ा महत्व है — कि यह समय सीमा के बंधन को तोड़कर सभी को माँ की कृपा का भागीदार बनाता है।

प्रारंभिक श्लोक

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजपः सिद्ध्यति॥

इस श्लोक का अर्थ है — हे देवी, सुनो, मैं श्रेष्ठ कुंजिका स्तोत्र का वर्णन करता हूँ, जिसके मंत्र के प्रभाव से चंडी जप सिद्ध हो जाता है। यहाँ माँ को स्वयं संबोधित किया गया है और बताया गया है कि इस स्तोत्र की शक्ति इतनी है कि यह संपूर्ण चंडी जप को पूर्ण कर देती है। भक्त के लिए यही संदेश है कि माँ के इस नाम में सारी सिद्धि निहित है।

जप विधि

सिद्ध कुंजिका का पाठ प्रातः स्नान के बाद पवित्र आसन पर बैठकर करें। माँ दुर्गा की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाएं। संभव हो तो संकल्प लेकर पाठ आरंभ करें। पूर्ण सप्तशती पाठ हो, तो उससे पहले कुंजिका पढ़ें। यदि केवल कुंजिका ही कर रहे हों, तो उसे माँ का स्मरण करते हुए एकाग्र मन से पढ़ें और अंत में माँ से मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें। नवरात्रि के दिनों में यह पाठ विशेष फलदायी माना गया है।

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पूर्ण पाठ

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् । येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥ १॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् । न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥ २॥
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् । अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥ ३॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति । मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् । पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥ ४॥
अथ मन्त्रः । ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे । ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥ ५॥ इति मंत्रः ।
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि । नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥ ६॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि । जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे ॥ ७॥
ऐङ्कारी सृष्टिरूपायै ह्रीङ्कारी प्रतिपालिका । क्लीङ्कारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥ ८॥
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी । विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥ ९॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी । क्रां क्रीं क्रूं कुञ्जिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥ १०॥
हुं हुं हुङ्काररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी । भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥ ११॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षम् । धिजाग्रम् धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥ १२॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा । म्लां म्लीं म्लूं मूलविस्तीर्णा कुञ्जिकास्तोत्र हेतवे । सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं कुरूष्व मे ॥ १३॥
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे । अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥ १४॥
यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् । न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥ १५॥

लाभ

  • मनोकामना पूर्ति की विशेष मान्यता है।
  • चंडी पाठ की संपूर्णता और सिद्धि के लिए इसे आवश्यक माना गया है।
  • समय की कमी वाले भक्तों के लिए साधना का सरल मार्ग है।
  • संकट काल में मन को स्थिरता और धैर्य मिलता है।

सिद्ध कुंजिका के साथ दुर्गा चालीसा और काली चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं। नवरात्रि में पूर्ण आयोजन के लिए दुर्गा पूजा विधि देखें।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।