अर्गला स्तोत्र — दुर्गा सप्तशती का स्तोत्र

दुर्गा सप्तशती, जिसे चंडी पाठ और देवी महात्म्य भी कहा जाता है, मार्कंडेय पुराण का एक अत्यंत पवित्र ग्रंथ है। इसमें माँ दुर्गा की महिमा सात सौ श्लोकों में वर्णित है। इसी सप्तशती के पाठ क्रम में तीन विशेष स्तोत्र आते हैं — देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र। इन्हीं में से अर्गला स्तोत्र माँ की स्तुति का वह स्वर है, जो चंडी पाठ की द्वारपाल के रूप में रक्षा करता है।

अर्गला का अर्थ

अर्गला शब्द का अर्थ होता है द्वार की कुंडी या अर्गल, अर्थात वह साधन जो द्वार को बंद या खोलता है। इसी से इस स्तोत्र का नाम अर्गला स्तोत्र रखा गया है। माना जाता है कि जिस प्रकार अर्गला द्वार की रक्षा करती है, उसी प्रकार यह स्तोत्र साधक की रक्षा करता है। चंडी पाठ के समय यह स्तोत्र भक्त की रक्षा-चक्र के समान कार्य करता है, जिससे पाठ निर्विघ्न संपन्न होता है।

स्तोत्र का स्थान

दुर्गा सप्तशती में अर्गला स्तोत्र का पाठ माँ के पूर्वी या दक्षिणी द्वार की ओर किया जाता है और यह पाठ संपूर्ण चंडी पाठ का आवश्यक अंग माना जाता है। जो साधक पूर्ण चंडी पाठ करते हैं, वे इस स्तोत्र को निश्चित रूप से पढ़ते हैं। परंपरा में कहा गया है कि इसके बिना चंडी पाठ अधूरा माना जाता है, अतः इसे पाठ के आरंभ अथवा मध्य में स्थान दिया जाता है।

चुनिंदा श्लोक

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥

इस श्लोक में माँ के अनेक नामों का स्मरण है। जयन्ती अर्थात विजय देने वाली, मंगला अर्थात मंगलकारिणी, काली अर्थात समय की स्वामिनी, भद्रकाली अर्थात कल्याण रूपा काली, कपालिनी अर्थात कपाल धारण करने वाली, दुर्गा अर्थात संकटों का नाश करने वाली, शिवा अर्थात कल्याणी, क्षमा अर्थात क्षमाशील, धात्री अर्थात संसार का पोषण करने वाली, स्वाहा और स्वधा अर्थात अग्नि और पितरों की प्रसन्नता देने वाली। इन सबको नमस्कार है। एक ही श्लोक में माँ के इतने रूपों का ध्यान करना ही इसकी विशेषता है।

पाठ विधि

नवरात्रि के दौरान जब चंडी पाठ किया जाता है, तब अर्गला स्तोत्र का पाठ पाठ से पहले या बाद में किया जाता है। पाठ के लिए पवित्र आसन पर बैठकर माँ दुर्गा का ध्यान करें। देवी कवच के बाद अर्गला स्तोत्र पढ़ा जाता है, तत्पश्चात कीलक स्तोत्र। इस क्रम को पूर्ण रूप से अपनाने वाले साधक के लिए पाठ निर्विघ्न होता है। संभव न हो तो केवल अर्गला स्तोत्र को ही श्रद्धापूर्वक पढ़ा जा सकता है।

अर्गला स्तोत्र का पूर्ण पाठ

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि । जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते .. १..
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते .. २..
मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ३..
महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ४..
धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ५..
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ६..
निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ७..
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ८..
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ९..
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १०..
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ११..
चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १२..
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १३..
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १४..
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १५..
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १६..
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १७..
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १८..
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १९..
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंसुते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २०..
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २१..
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २२..
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २३..
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २४..
भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २५..
तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २६..
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः । सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् .. २७..

लाभ

  • शत्रु-भय से रक्षा की मान्यता है।
  • पाठ के समय आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं।
  • भय और संकट के समय मन को शक्ति मिलती है।
  • चंडी पाठ की संपूर्णता के लिए इसे आवश्यक माना गया है।

अर्गला स्तोत्र के साथ दुर्गा चालीसा और काली चालीसा का पाठ उत्तम है। नवरात्रि की पूर्ण तैयारी के लिए दुर्गा पूजा विधि देखें।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।