कीलक स्तोत्र — दुर्गा सप्तशती का बाधा-नाशक पाठ

कीलक का शाब्दिक अर्थ है वह कील या खूँटा, जो किसी वस्तु को बाँधे रखता है या स्थिर करता है। जैसे कील बिना किसी चीज को टिकने नहीं देती, वैसे ही जो साधक के जीवन में आने वाली बाधाओं को बाँधकर रोक दे — उसे भी कीलक कहा गया है। दुर्गा सप्तशती में वर्णित कीलक स्तोत्र की मान्यता यही है कि यह बाधाओं को स्थिर करके समाप्त करता है और साधक की रक्षा करता है।

कीलक का रहस्य

सप्तशती की परंपरा के अनुसार कीलक वह शक्ति है, जो साधक और साधना के बीच आने वाले विघ्नों को रोकती है। जिस प्रकार यज्ञ में पवित्र रक्षा के लिए मंत्र बोले जाते हैं, उसी प्रकार चंडी पाठ में कीलक स्तोत्र उन विघ्नों का निवारण करता है, जो अज्ञानता, आलस्य, भय या बाहरी परिस्थितियों से उत्पन्न होते हैं। इसे सप्तशती के संपूर्ण फल की रक्षक माना गया है।

सप्तशती में स्थान

दुर्गा सप्तशती के पाठ क्रम में अर्गला स्तोत्र के बाद कीलक स्तोत्र का स्थान है। देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र — ये तीनों मिलकर चंडी पाठ के आरंभिक अंग बनते हैं। जो साधक पूर्ण चंडी पाठ करता है, वह इन तीनों को बिना स्किप किए पढ़ता है, क्योंकि इन्हीं से पाठ की सुरक्षा मानी गई है। कीलक स्तोत्र में माँ से प्रार्थना की जाती है कि वे पाठ को निर्विघ्न पूर्ण करें।

गायत्री श्लोक

ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्याकुमार्यै धीमहि। तन्नो दुर्गिः प्रचोदयात्॥

यह स्तोत्र की गायत्री मंत्र के रूप में है। इसका भाव है — हम ऋषि कात्यायन की कन्या कात्यायनी रूपी दुर्गा का ध्यान करते हैं। जो कन्या रूप में हिमालय के आश्रम में जन्मी और कुमारी के रूप में दुर्गा कहलाईं, उनका ध्यान करते हुए हम प्रार्थना करते हैं कि माँ हमारी बुद्धि को शुभ मार्ग पर प्रेरित करें। यहां कात्यायनी और कन्याकुमारी दोनों माँ दुर्गा के ही नाम हैं, और उन्हीं से हम सहायता मांगते हैं।

पाठ का समय

कीलक स्तोत्र का पाठ रात्रि जागरण में और चंडी पाठ के प्रारंभ में विशेष रूप से किया जाता है। नवरात्रि की रात्रियों में जब भक्त माँ के भजन और पाठ में जागते हैं, तब यह स्तोत्र उनकी रक्षा और स्थिरता के लिए पढ़ा जाता है। यदि पूर्ण चंडी पाठ संभव न हो, तो इस स्तोत्र को अकेले भी श्रद्धा से पढ़ा जा सकता है। समय की दृष्टि से प्रातःकाल और संध्या दोनों उपयुक्त माने गए हैं।

कीलक स्तोत्र का पूर्ण पाठ

विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे । श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्द्धधारिणे ॥१॥
सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् । सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ॥२॥
सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि । एतेन स्तुवतां देवि स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति ॥३॥
न मन्त्रो नौषधं तत्र न किच्ञिदपि विद्यते । विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम् ॥४॥
समग्राण्यपि सिद्ध्यन्ति लोकशङ्कामिमां हरः । कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ॥५॥
स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः । समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ॥६॥
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः | कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥७॥
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति । इत्थंरुपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥८॥
यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम् । स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥९॥
न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्कापीह जायते । नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥१०॥
ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति । ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ॥११॥
सौभाग्यादि च यत्किच्चिद् दृश्यते ललनाजने । तत्सर्वं तत्तप्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ॥१२॥
शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः । भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ॥१३॥
ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः । शत्रुहानिःपरो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ॥१४॥

लाभ

  • संकट और शत्रु की बाधा से रक्षा की मान्यता है।
  • पाठ में विघ्न और मन का विचलन दूर होता है।
  • भय समाप्त होता है और मन में धैर्य आता है।
  • चंडी पाठ का संपूर्ण फल प्राप्त करने में सहायक माना जाता है।

कीलक स्तोत्र के साथ दुर्गा चालीसा और काली चालीसा का पाठ उत्तम रहता है। नवरात्रि में पूर्ण पाठ-विधि के लिए दुर्गा पूजा विधि देखें।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।