गोविंदाष्टकम्

गोविंदाष्टकम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक प्रसिद्ध स्तोत्र है, जिसमें भक्ति और ज्ञान दोनों का समावेश है। इस स्तोत्र की खास बात यह है कि यह एक ओर भगवान को निराकार ब्रह्म बताता है, तो दूसरी ओर उसी ब्रह्म को गोकुल में खेलते हुए बालक गोविंद के रूप में भी चित्रित करता है। इस प्रकार यह स्तोत्र भक्त को याद दिलाता है कि जो ब्रह्म संसार के पार है, वही भक्तों के लिए प्रेम से भरा हुआ बालक भी है। यही इस स्तोत्र की अनोखी विशेषता मानी जाती है।

गोविंद शब्द का अर्थ

गोविंद का अर्थ है गौओं का स्वामी या भूमि को प्राप्त करने वाला। वेदों में गोविंद शब्द ईश्वर के लिए प्रयुक्त हुआ है। अष्टकम् में इसी गोविंद को सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनंत कहा गया है। साथ ही उसे गोकुल के आंगन में बालक के रूप में खेलता हुआ भी दर्शाया गया है। इस प्रकार एक ही स्तोत्र में भगवान के निराकार और साकार दोनों रूपों का वर्णन मिलता है, जो भक्त और ज्ञानी दोनों को समान रूप से आकर्षित करता है।

गोविंदाष्टकम् का मुख्य श्लोक

सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशं गोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलोलमनायासं परमायासम्।
मायोपममक्षरमेकं तुरीयं गोविन्दं प्रपद्येऽहम्॥

इस श्लोक में कहा गया है कि गोविंद सत्य, ज्ञान और अनंत स्वरूप हैं, वे नित्य हैं और आकाश से भी परे हैं। परंतु साथ ही वे गोष्ठ अर्थात गोकुल के आंगन में खेलने वाले बालक के रूप में भी हैं। माया के परे होकर भी वे एक और तुरीय अवस्था वाले हैं। मैं उसी गोविंद की शरण लेता हूं। इस प्रकार इस श्लोक में भगवान की सभी अवस्थाओं का एक साथ वर्णन किया गया है।

माया और तुरीय

शंकराचार्य की परंपरा में माया को संसार का कारण बताया जाता है। अष्टकम् यह सिखाता है कि भगवान माया के परे हैं, परंतु भक्ति के लिए वे माया में भी प्रकट होते हैं। तुरीय अर्थात चौथी अवस्था, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे है। गोविंद को इसी तुरीय अवस्था का स्वामी बताया गया है। इस स्तोत्र को पढ़ने वाला व्यक्ति भगवान के इन गहरे रूपों को समझने का प्रयास करता है, जो ज्ञान का विषय है।

जप और चिंतन

गोविंदाष्टकम् को धीरे-धीरे पढ़ना चाहिए, ताकि हर शब्द का भाव मन में उतरे। प्रातःकाल स्नान के बाद इसका पाठ करने की परंपरा है। जो व्यक्ति इस स्तोत्र को भक्ति भाव से पढ़ता है, उसके मन में संसार की चंचलता के प्रति मोह कम होता है। यह स्तोत्र भक्ति और ज्ञान दोनों को एक साथ आगे बढ़ाता है, इसलिए इसे दोनों मार्गों का समन्वय माना जाता है।

गोविन्दाष्टकम् का पूर्ण पाठ

श्रीगोविन्दाष्टकम्
सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशं गोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलोलमनायासं परमायासम् । मायाकल्पितनानाकारमनाकारं भुवनाकारं क्ष्मामानाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ १॥
मृत्स्नामत्सीहेति यशोदाताडनशैशव सन्त्रासं व्यादितवक्त्रालोकितलोकालोकचतुर्दशलोकालिम् । लोकत्रयपुरमूलस्तम्भं लोकालोकमनालोकं लोकेशं परमेशं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ २॥
त्रैविष्टपरिपुवीरघ्नं क्षितिभारघ्नं भवरोगघ्नं कैवल्यं नवनीताहारमनाहारं भुवनाहारम् । वैमल्यस्फुटचेतोवृत्तिविशेषाभासमनाभासं शैवं केवलशान्तं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ३॥
गोपालं प्रभुलीलाविग्रहगोपालं कुलगोपालं गोपीखेलनगोवर्धनधृतिलीलालालितगोपालम् । गोभिर्निगदितगोविन्दस्फुटनामानं बहुनामानं गोपीगोचरपथिकं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ४॥
गोपीमण्डलगोष्ठीभेदं भेदावस्थमभेदाभं शश्वद्गोखुरनिर्धूतोद्गतधूलीधूसरसौभाग्यम् । श्रद्धाभक्तिगृहीतानन्दमचिन्त्यं चिन्तितसद्भावं चिन्तामणिमहिमानं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ५॥
स्नानव्याकुलयोशिद्वस्त्रमुपादायागमुपारूढं व्यादित्सन्तीरथ दिग्वस्त्रा ह्युपुदातुमुपाकर्षन्तम् । निर्धूतद्वयशोकविमोहं बुद्धं बुद्धेरन्तस्थं सत्तामात्रशरीरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ६॥
कान्तं कारणकारणमादिमनादिं कालमनाभासं कालिन्दीगतकालियशिरसि मुहुर्नृत्यन्तं नृत्यन्तम् । कालं कालकलातीतं कलिताशेषं कलिदोषघ्नं कालत्रयगतिहेतुं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ७॥
वृन्दावनभुवि वृन्दारकगणवृन्दाराध्यं वन्देऽहं कुन्दाभामलमन्दस्मेरसुधानन्दं सुहृदानन्दम् । वन्द्याशेषमहामुनिमानसवन्द्यानन्दपदद्वन्द्वं वन्द्याशेषगुणाब्धिं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ८॥
गोविन्दाष्टकमेतदधीते गोविन्दार्पितचेता यो गोविन्दाच्युत माधव विष्णो गोकुलनायक कृष्णेति । गोविन्दाङ्घ्रिसरोजध्यानसुधाजलधौतसमस्ताघो गोविन्दं परमानन्दामृतमन्तःस्थं स तमभ्येति ॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीगोविन्दाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

लाभ

  • धार्मिक मान्यता के अनुसार इसके पाठ से मन स्थिर और शांत होता है।
  • ईश्वर के स्वरूप की गहरी समझ विकसित होती है।
  • संसार के मोह से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त माना जाता है।
  • नियमित पाठ से आत्मविश्वास और धैर्य बढ़ता है।
  • भक्ति के साथ ज्ञान का सही संतुलन बनता है।

गोविंद को विष्णु का ही स्वरूप माना जाता है, इसलिए विष्णु सहस्रनाम और विष्णु चालीसा इसके साथ पढ़े जा सकते हैं। शिव की भक्ति के लिए शिव तांडव स्तोत्र भी प्रसिद्ध है।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।