मधुराष्टकम्

मधुराष्टकम् महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा रचित भगवान कृष्ण की मधुरता का वर्णन करने वाला स्तोत्र है। इसमें हर श्लोक के अंत में मधुरं शब्द आता है, जिसका अर्थ है मीठा। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के रूप, गुण, वचन और लीला की मधुरता को एक साथ गाता है। पुष्टि मार्ग के अनुयायी इस स्तोत्र को विशेष प्रेम के साथ पढ़ते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे पढ़ते समय मन में भगवान की मधुर छवि स्वयं उभर आती है।

मधुर शब्द का भाव

मधुर शब्द केवल मीठे स्वाद के लिए नहीं आया है। यहां मधुर का अर्थ है आनंद से भरा, प्रेम से भरा और मन को मोह लेने वाला। जो सुंदरता, जो व्यवहार, जो भाव मन को आनंद से भर दे, वही मधुर है। अष्टकम् में भगवान के हर अंग और हर गुण को मधुर कहा गया है, क्योंकि भक्त की दृष्टि में कृष्ण की हर चीज मीठी है। यही भाव इस स्तोत्र का केंद्र बिंदु है, जिसे समझने के बाद पाठ करने वाले का मन स्वयं मधुर हो जाता है।

मधुराष्टकम् का एक प्रमुख श्लोक

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥

इस श्लोक में कहा गया है कि मधुरता के स्वामी भगवान के अधर, मुख, नयन, हास्य, हृदय और गमन सब कुछ मधुर है। यानी भगवान कृष्ण की हर चीज आनंद से परिपूर्ण है। यह श्लोक भक्त के मन में प्रेम और आनंद का भाव जगाता है। जब भक्त इसे पढ़ता है, तो उसे अनुभव होता है कि कृष्ण केवल दर्शनीय नहीं, बल्कि अनुभव करने योग्य हैं।

मधुराष्टकम् का विषय

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भगवान की विभूति नहीं, बल्कि उनकी मधुरता का गुणगान करता है। शास्त्रों में कृष्ण की लीला को मधुर लीला कहा जाता है। अष्टकम् पढ़ने वाला भक्त कृष्ण के इसी मधुर रूप का चिंतन करता है। यह चिंतन ही भक्ति का सरल मार्ग बनता है। जो लोग संसार की कटुता से दुखी हैं, उनके लिए यह स्तोत्र मधुरता का अनुभव कराने वाला उपाय है।

कैसे करें जप?

  • शांत मन से बैठकर एक श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें।
  • हर बार मधुरं शब्द पर भगवान के स्वरूप का ध्यान करें।
  • शुक्ल पक्ष या जन्माष्टमी के दिन यह पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
  • संध्याकाल में दीपक जलाकर पाठ करने की परंपरा है।
  • पाठ के बाद भगवान को भोग लगाएं।

मधुराष्टकम् से जुड़ी मान्यताएं

धार्मिक परंपरा के अनुसार इस स्तोत्र के पाठ से मन में प्रेम का भाव बढ़ता है। क्रोध और अशांति में कमी मानी जाती है। जो व्यक्ति कृष्ण की मधुरता का चिंतन करता है, उसका मन स्वतः निर्मल और प्रसन्न रहता है। यह स्तोत्र बच्चों को भी सिखाया जाता है, क्योंकि यह सरल और मधुर है। साथ ही यह माना जाता है कि इस स्तोत्र के पाठ से वाणी में भी मिठास आती है, क्योंकि मन जितना मधुर होता है, वाणी उतनी ही मधुर होती है।

कृष्ण भक्ति से जुड़े लोगों के लिए विष्णु चालीसा और विष्णु सहस्रनाम भी उपयोगी हैं।

मधुराष्टकम् का पूर्ण पाठ

॥ मधुराष्टक् ॥
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ १॥
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम् । चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ २॥
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ । नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ३॥
गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् । रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ४॥
करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम् । वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ५॥
गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा । सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ६॥
गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् । दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ७॥
गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा । दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ८॥
॥ इति श्रीमद्वल्लभाचार्यविरचितं मधुराष्टकं सम्पूर्णं ॥

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।