अच्युताष्टकम्

अच्युताष्टकम् भगवान विष्णु के अनेक नामों से युक्त एक सुंदर स्तोत्र है। इसका नाम सुनते ही सबसे पहले अच्युत शब्द मन में आता है। यह स्तोत्र विष्णु के नामों की एक माला के समान है, जिसमें हर नाम के साथ भगवान का एक अलग स्वरूप दर्शित होता है। इसकी विशेषता यह है कि इसे पढ़ते समय भक्त भगवान के सभी प्रमुख रूपों का स्मरण एक साथ करता है। यही कारण है कि इस स्तोत्र को विष्णु भक्ति का सरल अभ्यास माना जाता है।

अच्युत शब्द का अर्थ

अच्युत का अर्थ है जो कभी च्युत न हो, अर्थात जो कभी गिरे नहीं और कभी विचलित न हो। भगवान विष्णु को इसीलिए अच्युत कहा जाता है, क्योंकि वे सदा अपने धर्म और अपने भक्तों के साथ रहते हैं। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति अच्युत का नाम लेता है, उसके जीवन में भी कभी पतन नहीं आता। यह नाम भक्त को धैर्य और स्थिरता का पाठ पढ़ाता है।

अच्युताष्टकम् के नाम

इस स्तोत्र के प्रथम श्लोक में भगवान के कई नाम एक साथ आते हैं, जैसे अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ और रामचंद्र।

  • अच्युत – कभी विचलित न होने वाले
  • केशव – सुंदर केश वाले
  • राम – श्रीराम रूप
  • नारायण – सबके आधार
  • कृष्ण – आनंद के स्वरूप
  • दामोदर – प्रेम से बंधे हुए
  • वासुदेव – सर्वत्र व्याप्त
  • श्रीधर – लक्ष्मी के स्वामी
  • गोपिकावल्लभ – गोपियों के प्रिय
  • जानकीनायक – सीता के स्वामी

इन नामों में राम और कृष्ण दोनों रूप समान रूप से आते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि भक्त की दृष्टि में दोनों अवतार एक ही सत्य के रूप हैं। यही समन्वय इस स्तोत्र की विशेषता है।

अच्युताष्टकम् का मुख्य श्लोक

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे॥

इस श्लोक में भक्त कहता है कि मैं अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ और जानकीनायक रामचंद्र का भजन करता हूं। एक ही भगवान को विभिन्न नामों से पुकारते हुए उसके सभी स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस प्रकार यह श्लोक नामों के माध्यम से भगवान के संपूर्ण स्वरूप का दर्शन कराता है।

पाठ विधि

  1. प्रातःकाल स्नान करके पूर्व दिशा की ओर मुख करें।
  2. विष्णु जी की मूर्ति या तुलसी के पौधे के सामने बैठें।
  3. पहले श्री हरि का ध्यान करें।
  4. फिर अष्टकम् का पाठ धीरे-धीरे करें।
  5. अंत में भगवान को तुलसी दल अर्पित करें।

अच्युताष्टकम् का पूर्ण पाठ

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् । श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥ १ ॥
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् । इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे ॥ २ ॥
विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये । वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥ ३ ॥
कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे । अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥ ४ ॥
राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणम् । लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितो-ऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम् ॥ ५ ॥
धेनुकारिष्टहाऽनिष्टकृद्द्वेषिणां केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः । पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो बालगोपालकः पातु मां सर्वदा ॥ ६ ॥
विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् । वन्यया मालया शोभितोरःस्थलं लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ॥ ७ ॥
कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः । हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥ ८ ॥
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् । वृत्ततः सुन्दरं वेद्यविश्वम्भरं तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥ ९ ॥
॥ अच्युताष्टकं सम्पूर्णम् ॥

लाभ

धार्मिक परंपरा के अनुसार अच्युताष्टकम् का नियमित पाठ करने से मन की चंचलता कम होती है। जीवन में स्थिरता और साहस की वृद्धि मानी जाती है। यह स्तोत्र भगवान के नामों का अभ्यास कराता है, जिससे मन शुद्ध होता है और विष्णु भक्ति में रुचि बढ़ती है। साथ ही भगवान के प्रति समर्पण का भाव भी विकसित होता है, जो भक्ति का मूल माना जाता है।

विष्णु भक्ति में विष्णु सहस्रनाम का विशेष स्थान है। इसके साथ राम चालीसा भी पढ़ी जा सकती है।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।