दामोदराष्टकम्

दामोदराष्टकम् भक्ति रस से भरा हुआ एक स्तोत्र है, जो भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की महिमा का गान करता है। इस स्तोत्र का संबंध श्रीमद्भागवत की कथा से जोड़ा जाता है, जिसमें माता यशोदा बालक कृष्ण को रस्सी से बांधती हैं। यही घटना इस स्तोत्र का मूल भाव बनती है। जो भक्त इस स्तोत्र को प्रेम से पढ़ता है, वह उसी प्रेम के बंधन में बंधने का अनुभव करता है। यह स्तोत्र मातृ प्रेम और भक्ति प्रेम दोनों का सुंदर संगम है।

दामोदर शब्द का अर्थ

दामोदर दो शब्दों से बना है, दाम अर्थात रस्सी और उदर अर्थात पेट। माता यशोदा ने बालक कृष्ण के पेट पर रस्सी बांधकर उन्हें बांधा था, इसीलिए उनका नाम दामोदर पड़ा। परंतु भक्ति की दृष्टि में दामोदर का अर्थ और गहरा है, अर्थात जो प्रेम के बंधन से बंधे हों। भगवान भक्तों के प्रेम से बंधते हैं, यही इस स्तोत्र का मुख्य संदेश है। जो प्रेम भगवान को भी बांध सकता है, वही सच्चा प्रेम माना गया है।

माता यशोदा की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार बालक कृष्ण की शरारतों से परेशान होकर माता यशोदा ने उन्हें माखन चोरी करने से रोकने के लिए रस्सी से बांधना चाहा। परंतु जब उन्होंने रस्सी बांधी, तो वह छोटी पड़ गई। फिर भी माता के सच्चे प्रेम के आगे भगवान स्वयं बंध गए। इस कथा से सिखाया जाता है कि बल और भक्ति से नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण से भगवान को वश में किया जा सकता है। यही भाव दामोदराष्टकम् का आधार बनता है।

दामोदराष्टकम् का मुख्य श्लोक

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्।
परमानन्दं खेलनं गोगवां समूहे गोपालमत्यद्भुतं दामोदरं तम्॥

इस श्लोक में भक्त कहता है कि मैं उस सच्चिदानंद स्वरूप, कुंडलों से सुशोभित, गोकुल में प्रकट, परमानंद से खेलने वाले, गौओं के समूह में विचरने वाले अद्भुत गोपाल दामोदर को नमन करता हूं। इस प्रकार श्लोक में भगवान के रूप, आभूषण और लीला का एक साथ वर्णन मिलता है।

प्रेम भाव से पाठ

दामोदराष्टकम् को पढ़ने के लिए विद्या या कठोर साधना की आवश्यकता नहीं, केवल प्रेम की आवश्यकता है। भगवान को माता यशोदा के समान प्रेम करने वाला व्यक्ति ही इस स्तोत्र का सही भाव समझ सकता है। धार्मिक परंपरा में इसे बच्चों को भी सिखाया जाता है, क्योंकि इसका भाव सरल और मनोहर है। यह स्तोत्र भक्त को याद दिलाता है कि भगवान दूर नहीं, हमारे हृदय के समीप हैं।

पाठ विधि

  1. संध्या के समय शांत स्थान पर बैठें।
  2. घी का दीपक जलाएं।
  3. बालक कृष्ण का ध्यान करके पाठ शुरू करें।
  4. हर श्लोक को प्रेम से, धीरे-धीरे बोलें।
  5. पाठ के बाद माखन या मिश्री का भोग लगाएं।

दामोदराष्टकम् का पूर्ण पाठ

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम् । यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं परामृष्टमत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या ॥ १ ॥
रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं कराम्भोजयुग्मेन सातङ्कनेत्रम् । मुहुः श्वासकम्पत्रिरेखाङ्ककण्ठ- स्थितग्रैव-दामोदरं भक्तिबद्धम् ॥ २ ॥
इतीदृक् स्वलीलाभिरानन्दकुण्डे स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम् । तदीयेषिताज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे ॥ ३ ॥
वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा न चान्यं वृणेऽहं वरेषादपीह । इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः ॥ ४ ॥
इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलैर्- वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश्च गोप्या । मुहुश्चुम्बितं बिम्बरक्तधरं मे मनस्याविरास्तां अलं लक्षलाभैः ॥ ५ ॥
नमो देव दामोदरानन्त विष्णो प्रसीद प्रभो दुःखजालाब्धिमग्नम् । कृपादृष्टिवृष्ट्यातिदीनं बतानु गृहाणेश मां अज्ञमेध्यक्षिदृश्यः ॥ ६ ॥
कुवेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत् त्वया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च । तथा प्रेमभक्तिं स्वकं मे प्रयच्छ न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह ॥ ७ ॥
नमस्तेऽस्तु दाम्ने स्फुरद्दीप्तिधाम्ने त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने । नमो राधिकायै त्वदीयप्रियायै नमोऽनन्तलीलाय देवाय तुभ्यम् ॥ ८ ॥
इति श्रीमद्पद्मपुराणे श्री दामोदराष्टाकं सम्पूर्णम् ॥

लाभ

  • धार्मिक मान्यता के अनुसार इस पाठ से मन में प्रेम और करुणा बढ़ती है।
  • क्रोध और ईर्ष्या में कमी मानी जाती है।
  • बच्चों के संस्कार और उनके भक्ति भाव में वृद्धि होती है।
  • मन में निर्मलता और आनंद का अनुभव होता है।
  • कृष्ण भक्ति में गहरा जुड़ाव बनता है।

दामोदर भगवान को विष्णु का ही बाल स्वरूप माना गया है। इसलिए विष्णु सहस्रनाम और विष्णु चालीसा भी भक्ति में सहायक हैं।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।