अंगारक स्तोत्र — मंगल ग्रह शांति का पाठ

अंगारक कौन हैं? यह प्रश्न ज्योतिष और धर्म दोनों को जोड़ता है। अंगारक मंगल ग्रह के ही नाम हैं, जिन्हें पृथ्वी का पुत्र कहा गया है। वीरता और पराक्रम के देवता माने जाने वाले मंगल को जब भी ग्रहों के बीच कष्टकारी स्थिति में माना जाता है, तब उनकी शांति के लिए यह अंगारक स्तोत्र पढ़ा जाता है। मंगलवार को इनका वार माना गया है, इसलिए इस दिन पाठ करने की परंपरा सर्वाधिक प्रचलित है।

अंगारक का परिचय

अंगार का अर्थ होता है अंगारा यानी चमकता कोयला। मंगल की लाल-भड़कती कांति के कारण ही उन्हें अंगारक कहा गया। शास्त्रों में उन्हें लाल फूलों, लाल वस्त्र और हाथ में शक्ति (भाला) धारण करने वाला वीर कुमार बताया गया है। जिस प्रकार अंगारा ठंडा होने पर भी गर्मी समेटे रखता है, उसी प्रकार मान्यता है कि मंगल की उपासना से व्यक्ति के भीतर साहस सदा बना रहता है।

मंगल दोष में यह स्तोत्र क्यों

जन्मकुंडली में जब मंगल ऐसी स्थिति में होता है, जिसे अंगारक दोष या मंगल दोष कहा जाता है, तब व्यक्ति को विवाह में विलंब, संबंधों में तनाव, संपत्ति के विवाद और अचानक क्रोध की परेशानी झेलनी पड़ सकती है। यह कोई निर्णय नहीं, बल्कि परंपरा में चली आ रही एक धारणा है। ऐसे में मंगल की कृपा पाने के लिए स्तोत्र पाठ को सरल मार्ग माना गया है। नवग्रह चालीसा के साथ इस स्तोत्र को जोड़कर पढ़ने की भी परंपरा है।

पाठ विधि

पाठ का समय सुबह का हो तो सर्वोत्तम है। रविवार या मंगलवार को स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूर्व की ओर मुख करके बैठें। सबसे पहले संकल्प करें और फिर मंगल की प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर यह स्तोत्र बोलें:

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥

अर्थ — पृथ्वी के गर्भ से जन्मे, बिजली की कांति जैसी प्रभा वाले, हाथ में शक्ति धारण करने वाले मंगल देवता को मैं प्रणाम करता हूँ। इस श्लोक के बाद ग्यारह या इक्कीस बार यह मंत्र बोलें:

ॐ अङ्गारकाय नमः॥

यह मंत्र मंगल को समर्पित सरल नमन है। पाठ समाप्ति पर क्षमा प्रार्थना करें और संकल्प में तय किया गया दान अवश्य करें।

दान और उपाय

मंगल शांति के लिए लाल वस्त्र, मसूर की दाल, गुड़ और लाल फूल दान करने की परंपरा है। इन्हें मंगलवार के दिन किसी योग्य व्यक्ति को या मंदिर में अर्पित करें। जिन्हें मंगल चालीसा से भावना के स्तर पर लाभ मिला है, वे इसे अंगारक स्तोत्र के साथ मिलाकर भी पढ़ सकते हैं। नवग्रहों की समग्र शांति चाहने वालों के लिए नवग्रह पूजा विधि भी उपलब्ध है।

अंगारक स्तोत्र का पूर्ण पाठ

अङ्गारकः शक्तिधरो लोहिताङ्गो धरासुतः ।
कुमारो मङ्गलो भौमो महाकायो धनप्रदः ॥ १ ॥
ऋणहर्ता दृष्टिकर्ता रोगकृद्रोगनाशनः ।
विद्युत्प्रभो व्रणकरः कामदो धनहृत् कुजः ॥ २ ॥
सामगानप्रियो रक्तवस्त्रो रक्तायतेक्षणः ।
लोहितो रक्तवर्णश्च सर्वकर्मावरोधकः ॥ ३ ॥
रक्तमाल्यधरो हेमकुण्डली ग्रहनायकः ।
नामान्येतानि भौमस्य यः पठेत्सततं नरः ॥ ४ ॥
ऋणं तस्य च दौर्भाग्यं दारिद्र्यं च विनश्यति ।
धनं प्राप्नोति विपुलं स्त्रियं चैव मनोरमाम् ॥ ५ ॥
वंशोद्योतकरं पुत्रं लभते नात्र संशयः ।
योऽर्चयेदह्नि भौमस्य मङ्गलं बहुपुष्पकैः ।
सर्वाः नश्यति पीडा च तस्य ग्रहकृता ध्रुवम् ॥ ६ ॥
इति श्रीस्कान्दपुराणे श्री अङ्गारक स्तोत्रम् ॥

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।