काशी विशालाक्षी शक्तिपीठ वाराणसी के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट के निकट स्थित एक अत्यंत पवित्र शक्तिपीठ है। पीठनिर्णय स्थानमाला के अनुसार, जब देवी सती की भौंहें इस पवित्र स्थान पर गिरीं, तब यहाँ विशालाक्षी देवी का प्राकट्य हुआ। कालभैरव यहाँ भैरव के रूप में पूजे जाते हैं।
परिचय
काशी विशालाक्षी शक्तिपीठ वाराणसी के सबसे प्राचीन और पूजनीय शक्तिपीठों में से एक है। पीठनिर्णय स्थानमाला के अनुसार यहाँ देवी सती की भौंहें गिरी थीं। विशालाक्षी का अर्थ है विशाल नेत्रों वाली देवी। यह नाम दर्शाता है कि देवी का स्वरूप अत्यंत विशाल और सर्वव्यापी है। यह पीठ काशी क्षेत्र के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है।
वाराणसी शहर भगवान शिव की नगरी के रूप में विख्यात है, परंतु यहाँ शक्ति की उपासना की परंपरा भी उतनी ही प्राचीन है। काशी विशालाक्षी मंदिर इस परंपरा का एक जीवंत प्रमाण है। मंदिर मणिकर्णिका घाट के समीप स्थित है, जो काशी के सबसे पवित्र घाटों में से एक है।
पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दक्ष प्रजापति के यज्ञ में देवी सती ने अग्नि में अपने आप को समर्पित कर दिया, तब भगवान शिव अत्यंत व्याकुल हो गए। वे सती के शव को लेकर सृष्टि में विचरण करने लगे। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के विभिन्न अंगों को काटा और वे पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरे।
पीठनिर्णय स्थानमाला के अनुसार, देवी सती की भौंहें वाराणसी के इस पवित्र स्थान पर गिरीं। जहाँ भौंहें गिरीं, वहाँ विशालाक्षी देवी का प्राकट्य हुआ। भौंहें देखने की शक्ति से संबंधित हैं, इसलिए विशालाक्षी देवी को सर्वदर्शी और सर्वव्यापी माना जाता है। काशीखंड में वर्णित है कि विशालाक्षी देवी काशी की रक्षक हैं।
शिवपुराण में भी काशी क्षेत्र के शक्तिपीठों का विस्तृत वर्णन मिलता है। मार्कण्डेय पुराण में देवी माहात्म्य का वर्णन करते हुए शक्तिपीठों की महिमा का विवरण दिया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार काशी विशालाक्षी पीठ शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र है।
भौगोलिक स्थिति
काशी विशालाक्षी मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी नगर में मणिकर्णिका घाट के निकट स्थित है। वाराणसी गंगा नदी के दाएँ तट पर बसा है और यह भारत के सबसे प्राचीन नगरों में गिना जाता है। मंदिर शहर के प्राचीन हिस्से में स्थित है जहाँ संकरी गलियाँ और प्राचीन वास्तुकला देखने को मिलती है।
वाराणसी उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित है और समुद्र तल से लगभग 80 मीटर की ऊँचाई पर है। वाराणसी कैंट और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं। लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बाबतपुर में स्थित है।
ऐतिहासिक महत्व
काशी विशालाक्षी मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। वाराणसी को हजारों वर्षों से धार्मिक नगरी के रूप में जाना जाता है। पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि वाराणसी में मानव बस्ती के अवशेष लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से मिलते हैं। ग्रीक लेखक मेगास्थनीज ने भी वाराणसी का उल्लेख किया है।
विभिन्न कालखंडों में इस मंदिर का पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार किया गया। गुप्तकाल में इस क्षेत्र में शैव और शाक्त दोनों परंपराओं का विकास हुआ। मध्यकाल में काशी नरेशों ने इस मंदिर के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुगल काल में भी मंदिर अपनी परंपराओं को बनाए रखने में सफल रहा।
धार्मिक परंपरा
काशी विशालाक्षी मंदिर में देवी विशालाक्षी की पूजा मुख्य रूप से होती है। विशालाक्षी देवी को सर्वदर्शी माना जाता है। मंदिर में कालभैरव की भी पूजा होती है जो इस पीठ के रक्षक माने जाते हैं। शक्ति उपासना में यह पीठ विशेष महत्व रखता है।
नवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष पूजा और अनुष्ठान किए जाते हैं। तांत्रिक परंपरा में भी यह पीठ महत्वपूर्ण माना जाता है। कुलार्णव तंत्र में शक्तिपीठों की तांत्रिक पूजा का विधान है। यहाँ दुर्गा सप्तशती का पाठ और ललिता सहस्रनाम का जप विशेष फलदायक माना जाता है।
वार्षिक उत्सव
काशी विशालाक्षी मंदिर में नवरात्रि सबसे प्रमुख उत्सव है। चैत्र नवरात्रि और आश्विन नवरात्रि दोनों में यहाँ विशेष पूजा, भजन और दुर्गा सप्तशती पाठ का आयोजन होता है। अष्टमी और नवमी के दिन विशेष हवन किया जाता है।
महाशिवरात्रि, गंगा दशहरा और कार्तिक पूर्णिमा भी यहाँ महत्वपूर्ण उत्सव हैं। पूर्णिमा के दिन मंदिर में विशेष आरती और प्रसाद वितरण होता है। सोमवार को शिवलिंग का दूध और जल से अभिषेक किया जाता है।
यात्रा मार्गदर्शन
काशी विशालाक्षी मंदिर वाराणसी शहर के प्राचीन भाग में मणिकर्णिका घाट के निकट स्थित है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 5 किलोमीटर दूर है। लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बाबतपुर में स्थित है। दिल्ली, लखनऊ, पटना और कोलकाता से सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं।
मंदिर तक पहुँचने के लिए गलियों से होकर जाना पड़ता है, इसलिए पैदल यात्रा या रिक्शा का उपयोग सबसे उपयुक्त है। गंगा नदी में नाव से भी मंदिर के निकट उतरा जा सकता है। वाराणसी में ठहरने के लिए अनेक विकल्प उपलब्ध हैं। यात्रियों को सलाह दी जाती है कि मंदिर के नियमों का पालन करें।
विभिन्न परंपराओं में मतभेद
भौंहें
— Pithanirnayaविशालाक्षी
— Pithanirnayaकालभैरव
— Pithanirnayaवाराणसी, उत्तर प्रदेश
— Pithanirnayaसर्वदर्शी शक्ति पीठ
— Pithanirnayaतांत्रिक शाक्त उपासना
— Pithanirnayaमतभेद और टिप्पणी
काशी विशालाक्षी शक्तिपीठ के संबंध में भिन्न परंपराओं में भिन्नता पाई जाती है। कुछ ग्रंथों में भौंहें गिरने का उल्लेख है जबकि अन्य में नेत्र संबंधी अंग का वर्णन है। वाराणसी में अन्य शक्तिपीठों के साथ इस पीठ की पहचान को लेकर भी कुछ भिन्नताएँ हैं।
यह लेख पीठनिर्णय स्थानमाला, शिवपुराण, देवी भागवत पुराण और स्थानीय मंदिर परंपराओं पर आधारित है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
काशी विशालाक्षी शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मणिकर्णिका घाट के निकट स्थित है।
विशालाक्षी का अर्थ है विशाल नेत्रों वाली देवी। ऐसा माना जाता है कि देवी की दृष्टि सम्पूर्ण ब्रह्मांड को देखती है।
यहाँ देवी सती की भौंहें गिरी थीं। शक्ति उपासकों के लिए यह एक प्रमुख तीर्थ स्थल है।
नवरात्रि, महाशिवरात्रि, गंगा दशहरा और कार्तिक पूर्णिमा प्रमुख उत्सव हैं।
वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन निकटतम है। गलियों से होकर पैदल या रिक्शा से मंदिर तक पहुँचा जा सकता है।
जब देवी सती की भौंहें इस स्थान पर गिरीं, तब विशालाक्षी देवी का प्राकट्य हुआ। यह घटना दक्ष यज्ञ के पश्चात हुई।
संबंधित शक्तिपीठ
स्रोत और संदर्भ
- काशी के शक्तिपीठ , बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
- इंडिका — मेगास्थनीज
- पीठनिर्णय स्थानमाला — अत्रि
- शिवपुराण - काशीखंड — वेद व्यास
- उत्तर प्रदेश पर्यटन
- देवी भागवत पुराण — वेद व्यास
- मार्कण्डेय पुराण
- कुलार्णव तंत्र