लक्ष्मीनारायण पूजा में भगवान विष्णु (नारायण) और माँ लक्ष्मी के युगल रूप की एक साथ उपासना की जाती है। परंपरा में विष्णु को पालनकर्ता और लक्ष्मी को समृद्धि की देवी माना गया है; इनके युगल रूप को धन, वैभव और सुख-समृद्धि का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। कई मंदिरों में 'लक्ष्मीनारायण' के रूप में एक साथ विराजित इनकी मूर्ति की पूजा होती है।
इस लेख में लक्ष्मीनारायण पूजा की सामग्री, चरणबद्ध विधि, मंत्र और आरती दी गई है। अलग-अलग रूप से विष्णु पूजा की विधि विष्णु पूजा विधि और लक्ष्मी पूजन की परंपरा दीपावली के लक्ष्मी पूजन में मिलती है।
लक्ष्मीनारायण पूजा का महत्व
लक्ष्मीनारायण की युगल पूजा में धन और धर्म दोनों की समन्वित उपासना का भाव है — लक्ष्मी अर्थ-समृद्धि की अधिष्ठात्री हैं और नारायण उनके पति एवं जगत के पालनकर्ता। पारिवारिक परंपरा में इस पूजा को घर में सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। पूजा का मूल आधार श्रद्धा और संयम है।
लक्ष्मीनारायण पूजा कब करें
- गुरुवार (बृहस्पतिवार) — कई घरों में विष्णु-लक्ष्मी पूजा का विशेष दिन माना जाता है।
- कार्तिक मास और शरद पूर्णिमा जैसे विशेष अवसरों पर।
- दीपावली के लक्ष्मी पूजन के दिन भी युगल रूप की पूजा की जाती है।
- गृहप्रवेश, नए कार्य की शुरुआत, विवाह आदि शुभ अवसरों पर।
विशेष अनुष्ठान का मुहूर्त पंचांग या पंडित से देखने का प्रचलन है।
लक्ष्मीनारायण पूजा की सामग्री
- लक्ष्मीनारायण (युगल) की मूर्ति या चित्र,
- पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, मिश्री,
- गंगाजल, शुद्ध जल,
- पीले पुष्प (विष्णु हेतु) एवं लाल/गुलाबी पुष्प (लक्ष्मी हेतु),
- तुलसी दल, अक्षत,
- चंदन, कुमकुम, हल्दी,
- धूप, घी का दीपक, कपूर,
- नैवेद्य — खीर, केला, मिश्री, मखाना, नारियल,
- कलश हेतु पात्र, पत्ते, नारियल,
- आसन, घंटी, पूजा की थाली।
लक्ष्मीनारायण पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — शुद्धि, आचमन एवं गणेश स्मरण
स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, पूजा स्थल साफ करें और गणेश स्मरण करें।
चरण 2 — संकल्प एवं कलश स्थापना
संकल्प करें ('अमुक' स्थानों पर अपनी जानकारी भरें) और कलश की स्थापना करें। कलश में गंगाजल, सुपारी, अक्षत, सिक्का रखकर पत्तों और नारियल से कलश पूर्ण करें।
चरण 3 — ध्यान एवं आवाहन
विष्णु का प्रचलित ध्यान श्लोक (पूरा विष्णु पूजा विधि में):
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
लक्ष्मी का ध्यान-श्लोक क्षेत्रीय परंपरा में भिन्न मिलता है; यदि परिवार में प्रचलित हो तो उसका प्रयोग करें, अन्यथा माँ लक्ष्मी का चित्रण स्मरण कर श्रद्धापूर्वक पूजा करें।
चरण 4 — युगल रूप का षोडशोपचार पूजन
युगल मूर्ति/चित्र पर दोनों रूपों को साथ-साथ निम्न उपचार अर्पित किए जाते हैं। सामान्य क्रम — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान/पंचामृत, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा, पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा। मंत्र-प्रारूप:
ॐ श्रीं लक्ष्म्यै नमः [उपचार] समर्पयामि।
जैसे — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पाद्यं समर्पयामि, ॐ श्रीं लक्ष्म्यै नमः पाद्यं समर्पयामि। (प्रत्येक उपचार दोनों रूपों को अर्पित होता है।)
चरण 5 — तुलसी अर्पण
चरण 6 — मंत्र जप
पूजा के बाद प्रचलित मंत्रों का जप करें:
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
लक्ष्मी गायत्री के कुछ क्षेत्रीय संस्करण भी प्रचलित हैं।
चरण 7 — आरती
अंत में विष्णु और लक्ष्मी की आरती करें। प्रचलित आरतियाँ — जय जगदीश हरे और ॐ जय लक्ष्मी माता।
चरण 8 — प्रसाद एवं समर्पण
आरती के बाद प्रसाद वितरित करें। भगवान को सब समर्पित करने का प्रचलित श्लोक:
करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि॥
लक्ष्मीनारायण पूजा के नियम
- पूजा सात्विक रूप से करें; घर में स्वच्छता और व्यवस्था का ध्यान रखें।
- युगल पूजा में दोनों रूपों का समान भाव से पूजन करें — किसी एक को कम न समझें।
- पूजा के बाद प्रसाद और दान का विशेष प्रचलन है।
- व्रत रखने की इच्छा हो तो स्वास्थ्य के अनुसार रखें; पूजन स्वयं पर्याप्त है।