विष्णु सहस्रनाम भगवान विष्णु के एक हजार (सहस्र) नामों का संकलन है। परंपरा के अनुसार यह महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को कहे गए प्रसंग में मिलता है। सहस्रनाम के पाठ को विष्णु की उपासना में विशेष स्थान दिया गया है। इस लेख में विष्णु सहस्रनाम पाठ/जप की पूजा विधि — संकल्प, विष्णु पूजन, पाठ-क्रम, नियम और पारण दी गई है।

सहस्रनाम का पूरा पाठ विष्णु सहस्रनाम (स्तोत्र) पृष्ठ पर उपलब्ध है। यहाँ उस पाठ को विधिपूर्वक करने का क्रम बताया गया है।

विष्णु सहस्रनाम पूजा का महत्व

विष्णु सहस्रनाम में भगवान विष्णु के विभिन्न नामों, गुणों और रूपों का वर्णन है। परंपरा में इसे विष्णु-भक्ति का प्रमुख स्तोत्र माना गया है। सहस्रनाम का नियमित पाठ/जप करने वाले इसे शांति, एकाग्रता और विष्णु-कृपा का साधन मानते हैं। पाठ का लाभ श्रद्धा, नियमितता और शुद्ध उच्चारण पर निर्भर माना गया है।

विष्णु सहस्रनाम पूजा की तैयारी

  • समय: प्रातःकाल स्नान के बाद सबसे उत्तम माना गया है; नित्य कुछ अंश या पूरे सहस्रनाम का पाठ किया जा सकता है।
  • स्थान: स्वच्छ, शांत स्थान; विष्णु की मूर्ति/चित्र या शालिग्राम के समक्ष।
  • आसन: पाठ आसन पर बैठकर करें।
  • शुद्धि: स्वच्छ वस्त्र, स्नान; पाठ से पहले मुख-शुद्धि।
  • उपवास: कई परंपराओं में सहस्रनाम पाठ के दिन उपवास/फलाहार रखा जाता है; स्वास्थ्य के अनुसार करें।

सहस्रनाम पूजा की सामग्री

  • सहस्रनाम का पाठ-पुस्तक/प्रति,
  • विष्णु की मूर्ति/चित्र या शालिग्राम,
  • जल, गंगाजल, पंचामृत,
  • तुलसी दल, पीले पुष्प, अक्षत,
  • चंदन, कुमकुम,
  • धूप, दीपक, कपूर,
  • नैवेद्य — मिश्री, केला, खीर/फल,
  • आसन, घंटी।

विष्णु सहस्रनाम पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — स्नान, आचमन एवं गणेश स्मरण

स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। आसन पर बैठकर आचमन करें और गणेश स्मरण करें।

ॐ गं गणपतये नमः।

चरण 2 — संकल्प

सहस्रनाम पाठ का संकल्प करें ('अमुक' स्थानों पर अपनी जानकारी भरें):

मम उपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा श्रीविष्णोः प्रीत्यर्थं
विष्णुसहस्रनामपाठं करिष्ये।

चरण 3 — विष्णु का ध्यान

प्रचलित विष्णु ध्यान श्लोक:

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

पाठ के आरंभ में प्रचलित पूजन-ध्यान श्लोक भी मिलता है:

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

चरण 4 — विष्णु पूजन

पाठ से पहले विष्णु का संक्षिप्त पूजन करें — आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान (जल/पंचामृत), गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तुलसी अर्पण:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय [उपचार] समर्पयामि।
ॐ विष्णवे नमः तुलसीपत्रं समर्पयामि।

नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।

चरण 5 — सहस्रनाम पाठ/जप

  • पूर्ण पाठ: पूरे एक हजार नामों का पाठ — जैसा पुस्तक/पाठ-क्रम में है।
  • नियमित अभ्यास: नित्य एक निश्चित संख्या में नामों का पाठ (जैसे 108 नामों का जप) — पारिवारिक/अनुष्ठान परंपरा के अनुसार।
  • पाठ में शुद्ध उच्चारण और शांत एकाग्रता का ध्यान रखें।
  • पाठ के बीच अशुद्धि या गलती होने पर परंपरा में संशोधन-क्रम कहा जाता है; गुरु/पंडित के मत के अनुसार करें।

नाम-पाठ के बीच विष्णु गायत्री का जप भी किया जाता है:

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

चरण 6 — आरती एवं पुष्पांजलि

पाठ के बाद विष्णु की आरती करें — जय जगदीश हरे आरती — और पुष्पांजलि अर्पित करें।

चरण 7 — पारण (व्रत हो तो)

यदि पाठ के दिन उपवास रखा गया हो तो अगले दिन प्रातः स्नान के बाद पारण करें। पारण का समय पंचांग देखें।

सहस्रनाम पाठ के नियम

  • पाठ स्वच्छ स्थान और शांत मन से करें; जल्दबाज़ी में पाठ न करें।
  • शुद्ध उच्चारण से अधिक भाव-श्रद्धा महत्वपूर्ण है — अज्ञात नामों के उच्चारण में संकोच न करें, श्रद्धा रखें।
  • पाठ के दिन ब्रह्मचर्य-संयम का विशेष ध्यान रखने की परंपरा है।
  • दान-दक्षिणा का भी प्रचलन है; पारिवारिक परंपरा के अनुसार।
  • अनुष्ठानिक पाठ (निश्चित दिनों का) करने से पहले गुरु या पंडित से विधि पूछना उचित है।

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