गौरी पूजा का विशेष महत्व सौभाग्य और दांपत्य सुख की देवी के रूप में है। माता गौरी (पार्वती) को सुहाग की देवी माना जाता है और इनकी पूजा विशेषकर श्रावण शुक्ल तृतीया (हरितालिका तीज) एवं चैत्र नवरात्रि में की जाती है। इस लेख में गौरी पूजा की संपूर्ण विधि, सामग्री, मंत्र, उपचार और नियम सरल भाषा में दिए गए हैं।

गौरी पूजा का महत्व

परंपरा में गौरी देवी पार्वती का ही स्वरूप हैं, जिन्हें शिव की अर्धांगिनी माना जाता है। इनकी पूजा से सौभाग्य, सुहाग, संतान सुख और पति की लंबी आयु की कामना की जाती है। माना जाता है कि देवी पार्वती ने स्वयं भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए गौरी पूजा की थी। विवाह से पहले और विवाहित स्त्रियाँ विशेष रूप से गौरी की पूजा करती हैं।

गौरी पूजा कब करें?

  • हरितालिका तीज: भाद्रपद शुक्ल तृतीया — गौरी-शिव पूजा का प्रमुख पर्व।
  • चैत्र नवरात्रि: चैत्र शुक्ल अष्टमी आदि दिनों में गौरी पूजन।
  • सावन तृतीया / सोमवार: श्रावण मास में गौरी पूजा विशेष फलदायी मानी गई है।
  • मंगलवार/शुक्रवार: देवी-पूजा के प्रचलित दिन।

गौरी पूजा की सामग्री

  • गौरी माता की मूर्ति/चित्र, आसन,
  • लाल वस्त्र, चुनरी, सुहाग-सामग्री (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, कुमकुम),
  • रोली, हल्दी, अक्षत, चंदन, पुष्प,
  • श्रृंगार की वस्तुएँ — कंघी, दर्पण, महावर, मेहंदी,
  • नैवेद्य — फल, मिठाई, गुड़-चना, सुहावन,
  • धूप, दीप, कपूर, घंटी, शुद्ध जल।

गौरी पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — स्नान एवं संकल्प

प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर लाल वस्त्र बिछाकर गौरी माता की मूर्ति/चित्र स्थापित करें। संकल्प करें:

मम उपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा गौरीमातृप्रीत्यर्थं
गौरीपूजनं करिष्ये।

चरण 2 — गणेश स्मरण

ॐ गं गणपतये नमः।

चरण 3 — गौरी माता का ध्यान-पूजन

माता का ध्यान करते हुए उपचार-अर्पण करें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पांजलि। प्रचलित प्रारूप:

ॐ श्री गौर्यै नमः [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम मंत्र में [उपचार] के स्थान पर बोलें।

चरण 4 — गौरी माता का आवाहन-मंत्र

हरितालिका तीज पर गौरी-शिव के पूजन का विधान है। गौरी का आवाहन करते समय यह प्रार्थना करें:

गौरी मे प्रीयतां नित्यं अघनाशाय मंगला।
सौभाग्यायास्तु ललिता भवानी सर्वसिद्धये॥

चरण 5 — श्रृंगार एवं सोलह उपचार

माता गौरी को श्रृंगार की सामग्री — चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहंदी, लाल चुनरी — अर्पण करें। परंपरा में गौरी का सोलह श्रृंगार करने का विधान है: पायल, चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, कंघी, तिलक, महावर, मेहंदी, नथनी, कान, आँख (काजल), हार, चुनरी, कुंदन, साड़ी एवं इत्र। इसके बाद माता का अंग-पूजन भी किया जा सकता है (चरणों से मस्तक तक विभिन्न नामों से पुष्प अर्पण)।

चरण 6 — देवी मंत्र जप एवं आरती

ॐ श्री गौर्यै नमः।

गौरी माता का मंत्र जप करें और माता की आरती करें। भोग अर्पण करें और अंत में क्षमा-प्रार्थना करें:

आवाहनं न जानामि न जानामि तथार्चनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥

गौरी पूजा के नियम

  • गौरी पूजा में सुहाग-सामग्री (श्रृंगार की वस्तुएँ) अर्पण करना प्रचलित है।
  • हरितालिका तीज पर गौरी-शिव की संयुक्त पूजा करें।
  • पूजा के दिन सात्विक भोजन का पालन करें।
  • सुहागिन स्त्रियाँ श्रद्धा भाव से ही पूजा करें — किसी भी प्रकार का भेदभाव न करें।
  • पूजा की स्वच्छता और श्रद्धा बनाए रखें।