गणगौर पूजा का विशेष महत्व राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत में सौभाग्य एवं दांपत्य सुख की कामना से किया जाता है। यह पर्व चैत्र मास (चैत्र शुक्ल तृतीया — गणगौर) में मनाया जाता है और इसमें गणेश एवं गौरी (पार्वती) दोनों की पूजा होती है। इस लेख में गणगौर पूजा की संपूर्ण विधि, सामग्री, मंत्र, परंपरा और नियम सरल भाषा में दिए गए हैं।
गणगौर पूजा का महत्व
गणगौर = गण (गणेश) + गौर (गौरी/पार्वती)। परंपरा में देवी पार्वती को गौर और भगवान गणेश को गण कहा गया है। चैत्र शुक्ल तृतीया को माता गौर का पुनर्जन्म माना गया है, इसलिए इस दिन गणगौर का पर्व मनाया जाता है। विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु के लिए और कुंवारी कन्याएँ मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए गणगौर की पूजा करती हैं। यह पर्व विशेषकर राजस्थान में धूमधाम से मनाया जाता है, जहाँ घरों में गणगौर की प्रतिमा स्थापित कर पूरे चैत्र मास विविध रीति-रिवाजों के साथ पूजन होता है।
गणगौर पूजा कब करें?
- चैत्र शुक्ल तृतीया: गणगौर का प्रमुख पर्व।
- पूरे चैत्र मास: राजस्थान में प्रतिमा स्थापित कर मास-भर पूजन की परंपरा है।
- हरितालिका तीज: भाद्रपद शुक्ल तृतीया को भी गौरी-पूजन का विधान है।
गणगौर पूजा की सामग्री
- गणगौर की प्रतिमा (गोबर/मिट्टी/चित्र से निर्मित),
- गणेश एवं गौरी की मूर्ति, आसन,
- रोली, कुमकुम, सिंदूर, हल्दी, अक्षत, चंदन,
- लाल वस्त्र, सुहाग-सामग्री, फूल, बेर के फल,
- नैवेद्य — हलवा, पूड़ी, मिठाई, फल,
- धूप, दीप, कपूर, घंटी, शुद्ध जल।
गणगौर पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — स्नान एवं संकल्प
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के प्रांगण में गणगौर की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा का संकल्प करें:
गणगौरपूजनं करिष्ये।
चरण 2 — गणेश स्मरण
गणगौर में पहले गणेश जी की पूजा की जाती है, फिर गौर की:
चरण 3 — गणगौर का ध्यान-पूजन
गणेश एवं गौरी का ध्यान करते हुए उपचार-अर्पण करें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पांजलि। प्रचलित प्रारूप:
नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम मंत्र में [उपचार] के स्थान पर बोलें।
चरण 4 — गौरी का आवाहन-मंत्र
गौर माता का आवाहन करते समय यह प्रार्थना करें:
सौभाग्यायास्तु ललिता भवानी सर्वसिद्धये॥
चरण 5 — सुहाग-सामग्री अर्पण
माता को श्रृंगार की सामग्री — चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहंदी, लाल चुनरी, नथ, बिछिया — अर्पण करें। साथ ही बेर के फल चढ़ाना प्रचलित है। गणगौर की परंपरा में सुहागिन स्त्रियाँ विशेष मांगलिक गीत गाती हैं।
चरण 6 — भोग, आरती एवं विसर्जन
माता को नैवेद्य भोग लगाएँ, आरती करें और अंत में पूर्ण क्षमा-प्रार्थना करें। पर्व समाप्ति पर प्रतिमा का विधिवत विसर्जन किया जाता है:
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥
गणगौर पूजा के नियम
- गणगौर में पहले गणेश पूजन और बाद में गौरी पूजन का क्रम रखें।
- पूजा में सुहाग-सामग्री एवं मांगलिक वस्तुएँ अर्पण करें।
- चैत्र मास में गणगौर की प्रतिमा स्थापित कर नियमित पूजन करें।
- पर्व के अवसर पर विवाहित स्त्रियाँ विवाहित मित्रों-संबंधियों के लिए मांगलिक उपहार भेजती हैं।
- पूजा श्रद्धा, स्वच्छता और उल्लास के साथ करें।