अहोई अष्टमी व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन रखा जाता है। यह व्रत संतान की लंबी उम्र की कामना के लिए किया जाता है। इस लेख में अहोई अष्टमी पूजा की विधि, सामग्री, मंत्र, व्रत और नियम की जानकारी सरल भाषा में दी गई है।
अहोई अष्टमी व्रत का महत्व
अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के कुछ दिन बाद रखा जाता है। इसे संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए माताएं करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान को रोगों से मुक्ति मिलती है और घर में शांति बनी रहती है। इस दिन माता अहोई (अहोई देवी) और उनके आठ पुत्रों (अष्टक) का पूजन किया जाता है।
अहोई अष्टमी पूजा कब करें?
- व्रत तिथि: कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी (करवा चौथ के चार दिन बाद)।
- पूजा काल: संध्या काल, तारे दिखने के बाद।
अहोई अष्टमी पूजा की सामग्री
- रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन,
- पुष्प, दीपक, कपूर, घी,
- फल, मिठाई, हल्दी की गांठें,
- अहोई माता की तस्वीर/चित्र, जलपात्र,
- सफेद सूत, पूड़ियां (नैवेद्य)।
अहोई अष्टमी पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — स्नान एवं संकल्प
प्रातः स्नान कर अहोई माता का ध्यान करें। व्रत एवं पूजा का संकल्प करें।
चरण 2 — गणेश स्मरण
चरण 3 — अहोई माता का पूजन
अहोई माता की तस्वीर का पूजन करते हुए उपचार-अर्पण करें:
नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।
चरण 4 — अष्टक का पूजन
माता अहोई के आठ पुत्रों (अष्टक) को नमन करें। पूजा के बाद आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
अहोई अष्टमी व्रत के नियम
- यह व्रत संतान की दीर्घायु के लिए किया जाता है।
- इस दिन माताएं तारे दिखने तक निर्जला रहती हैं।
- संध्या काल में ही पूजा करने का विधान है।
- पूजा के बाद प्रसाद वितरण करें।