यमुना अष्टकम्

नदियों में यमुना का स्थान विशेष माना जाता है। वृंदावन, मथुरा और गोकुल की पवित्र भूमि से बहती हुई यमुना भगवान कृष्ण की बाल लीला स्थलों से जुड़ी हुई है। यमुना अष्टकम् उन्हीं यमुना माता की स्तुति में रचा गया स्तोत्र है। इसमें यमुना के जल की पवित्रता, उनके किनारे बीते कृष्ण के बाल लीला के क्षणों और भक्तों के प्रति उनकी दया का वर्णन मिलता है। जो भक्त यमुना की भक्ति करता है, वह कृष्ण की लीला भूमि से जुड़ता है, ऐसी धार्मिक मान्यता है।

यमुना और कृष्ण

यमुना का संबंध भगवान कृष्ण से अटूट माना जाता है। कृष्ण की बाल लीला में कालिया नाग को परास्त करने की घटना यमुना के जल में ही हुई थी। कृष्ण की रासलीला भी यमुना के तट पर संपन्न हुई। इसीलिए यमुना को कृष्ण भक्ति से जोड़कर देखा जाता है। कहा जाता है कि यमुना का किनारा कृष्ण की लीला का गवाह है, इसलिए यमुना का स्मरण करते ही भक्त के मन में कृष्ण की छवि उभर आती है। यही कारण है कि यमुना अष्टकम् को भक्ति के साथ प्रेम का स्तोत्र भी कहा जाता है।

यमुना की कथा

धार्मिक मान्यता के अनुसार यमुना सूर्य देव और उनकी पत्नी संज्ञा की पुत्री हैं। इसीलिए उन्हें यम की बहन भी कहा जाता है। यमुना के किनारे की भूमि को अत्यंत पवित्र माना जाता है, क्योंकि वहां कृष्ण की लीलाएं संपन्न हुईं। यमुना अष्टकम् में इन्हीं कथाओं और यमुना के स्वरूप का चिंतन किया जाता है। भक्त इसे पढ़ते समय यमुना के शीतल जल और पवित्र किनारों का भाव मन में बसाता है।

यमुना स्नान का महत्व

छठ पर्व में यमुना के तट पर घाटों पर स्नान और अर्घ्य की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यमुना स्नान से मन और शरीर दोनों की शुद्धि होती है। यमुना अष्टकम् का पाठ स्नान के समय या स्नान से पहले करने की परंपरा बताई जाती है। इससे यमुना माता की कृपा अधिक प्राप्त होती है, ऐसा विश्वास किया जाता है। जो भक्त यमुना के घाट पर नहीं जा सकते, वे घर में ही स्नान करते समय यमुना का स्मरण करके यह अष्टकम् पढ़ते हैं।

यमुना ध्यान

यमुना अष्टकम् केवल पाठ नहीं, बल्कि यमुना माता के स्वरूप पर ध्यान करने का माध्यम भी है। इसे पढ़ते समय यमुना के किनारों की पवित्र भूमि, उनके शीतल जल और कृष्ण लीला के दृश्यों का चिंतन किया जाता है। यह ध्यान भक्त के मन को शांत और स्थिर करने में सहायक माना जाता है। नियमित रूप से यमुना का स्मरण करने वाला व्यक्ति अपनी दिनचर्या में भी शांति और सरलता का अनुभव करता है।

यमुना अष्टकम् पढ़ने के लाभ

  • धार्मिक मान्यता के अनुसार यमुना की भक्ति से मन की अशांति कम होती है।
  • जल और प्रकृति से जुड़ाव का भाव विकसित होता है।
  • कृष्ण भक्ति के मार्ग में सहायता मिलती है।
  • पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा में यमुना का स्मरण किया जाता है।
  • छठ जैसे पर्वों पर यमुना पूजन से विशेष फल मिलने की मान्यता है।

यमुना स्नान के दौरान सूर्य चालीसा या सूर्य अर्घ्य विधि का पालन करना छठ पर्व से जुड़ी परंपरा है। इसके साथ गायत्री चालीसा भी स्नान काल में पढ़ी जा सकती है।

यमुना अष्टकम का पूर्ण पाठ

यमुनाष्टकम् २
॥ श्रीः॥
कृपापारावारां तपनतनयां तापशमनीं
मुरारिप्रेयस्यां भवभयदवां भक्तिवरदाम् ।
वियज्ज्वालोन्मुक्तां श्रियमपि सुखाप्तेः परिदिनं
सदा धीरो नूनं भजति यमुनां नित्यफलदाम् ॥ १॥
मधुवनचारिणि भास्करवाहिनि जाह्नविसङ्गिनि सिन्धुसुते
मधुरिपुभूषणि माधवतोषिणि गोकुलभीतिविनाशकृते ।
जगदघमोचिनि मानसदायिनि केशवकेलिनिदानगते
जय यमुने जय भीतिनिवारिणि संकटनाशिनि पावय माम् ॥ २॥
अयि मधुरे मधुमोदविलासिनि शैलविदारिणि वेगपरे
परिजनपालिनि दुष्टनिषूदिनि वाञ्छितकामविलासधरे ।
व्रजपुरवासिजनार्जितपातकहारिणि विश्वजनोद्धरिके
जय यमुने जय भीतिनिवारिणि संकटनाशिनि पावय माम् ॥ ३॥
अतिविपदम्बुधिमग्नजनं भवतापशताकुलमानसकं
गतिमतिहीनमशेषभयाकुलमागतपादसरोजयुगम् ।
ऋणभयभीतिमनिष्कृतिपातककोटिशतायुतपुञ्जतरं
जय यमुने जय भीतिनिवारिणि संकटनाशिनि पावय माम् ॥ ४॥
नवजलदद्युतिकोटिलसत्तनुहेमभयाभररञ्जितके
तडिदवहेलिपदाञ्चलचञ्चलशोभितपीतसुचेलधरे ।
मणिमयभूषणचित्रपटासनरञ्जितगञ्जितभानुकरे
जय यमुने जय भीतिनिवारिणि संकटनाशिनि पावय माम् ॥ ५॥
शुभपुलिने मधुमत्तयदूद्भवरासमहोत्सवकेलिभरे
उच्चकुलाचलराजितमौक्तिकहारमयाभररोदसिके ।
नवमणिकोटिकभास्करकञ्चुकिशोभिततारकहारयुते
जय यमुने जय भीतिनिवारिणि संकटनाशिनि पावय माम् ॥ ६॥
करिवरमौक्तिकनासिकभूषणवातचमत्कृतचञ्चलके
मुखकमलामलसौरभचञ्चलमत्तमधुव्रतलोचनिके ।
मणिगणकुण्डललोलपरिस्फुरदाकुलगण्डयुगामलके
जय यमुने जय भीतिनिवारिणि संकटनाशिनि पावय माम् ॥ ७॥
कलरवनूपुरहेममयाचितपादसरोरुहसारुणिके
धिमिधिमिधिमिधिमितालविनोदितमानसमञ्जुलपादगते ।
तव पदपङ्कजमाश्रितमानवचित्तसदाखिलतापहरे
जय यमुने जय भीतिनिवारिणि संकटनाशिनि पावय माम् ॥ ८॥
भवोत्तापाम्भोधौ निपतितजनो दुर्गतियुतो
यदि स्तौति प्रातः प्रतिदिनमन्याश्रयतया ।
हयाह्रेषैः कामं करकुसुमपुञ्जै रविसुतां
सदा भोक्ता भोगान्मरणसमये याति हरिताम् ॥ ९॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ
यमुनाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।