गंगा अष्टकम्

भारतीय संस्कृति में गंगा को माता का स्थान दिया गया है। कहा जाता है कि जहां गंगा का नाम लिया जाता है, वह स्थान पवित्र हो जाता है। गंगा अष्टकम् उसी गंगा माता की महिमा का वर्णन करने वाला स्तोत्र है। इस स्तोत्र का मुख्य भाग एक विशेष श्लोक है, जो जल की शुद्धि के लिए स्नान के समय बोला जाता है। यह श्लोक कई पवित्र नदियों को एक साथ स्मरण करके उन्हें अपने स्नान के जल में आमंत्रित करता है। इसीलिए इसे जल को पवित्र करने वाला मंत्र भी कहा जाता है।

गंगा अष्टकम् का मंत्र

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥

इस श्लोक का सरल भाव यह है कि हे गंगा, हे यमुना, हे गोदावरी, हे सरस्वती, हे नर्मदा, हे सिंधु और हे कावेरी, आप सभी इस जल में अपनी उपस्थिति प्रदान करें। अर्थात सभी पवित्र नदियों को स्मरण करके उनसे आग्रह किया जाता है कि वे स्नान के जल में समाहित हो जाएं। इस प्रकार एक ही स्नान में सभी नदियों के जल की पवित्रता का भाव उत्पन्न होता है।

यह श्लोक कैसे बोला जाता है?

जब भी कोई व्यक्ति स्नान करता है, तो प्रथम इस श्लोक का उच्चारण करता है। फिर जल को अर्पण करके स्नान किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार जिस जल में इस मंत्र से सभी नदियों का आह्वान किया जाता है, उस जल में स्नान करना सभी पवित्र नदियों में स्नान करने के समान माना जाता है। यही कारण है कि यह श्लोक हर स्नान के समय बोला जा सकता है, चाहे वह घर का स्नान हो या नदी का स्नान।

गंगास्नान का महत्व

गंगा स्नान का महत्व धार्मिक परंपरा में बहुत बड़ा माना गया है। कुंभ और अर्धकुंभ जैसे पर्वों पर गंगा स्नान के लिए लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। घर पर स्नान के दौरान भी गंगा अष्टकम् के इस श्लोक का पाठ करने से गंगास्नान के समान फल मिलता है, ऐसी धार्मिक मान्यता है। इसीलिए यह श्लोक हर व्यक्ति के लिए सरल उपाय है, जो नदी तक नहीं पहुंच सकते।

गंगा की महिमा

गंगा को भागीरथी, मंदाकिनी, देवपगा और जाह्नवी जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा धरती पर उतरीं। भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। इसी कथा के कारण गंगा का जल आज भी पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। गंगा अष्टकम् में इन्हीं गुणों और कथाओं का चिंतन करके भक्त गंगा माता की कृपा का अनुभव करते हैं।

गंगा अष्टकम का पूर्ण पाठ

श्रीगङ्गाष्टकम्
भगवति तव तीरे नीरमात्राशनोऽहं
विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि ।
सकलकलुषभङ्गे स्वर्गसोपानगङ्गे
तरलतरतरङ्गे देवि गङ्गे प्रसीद ॥ १॥
भगवति भवलीलामौलिमाले तवाम्भः
कणमणुपरिमाणं प्राणिनो ये स्पृशन्ति ।
अमरनगरनारीचामरमरग्राहिणीनां
विगतकलिकलङ्कातङ्कमङ्के लुठन्ति ॥ २॥
ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती
स्वर्लोकात् आपतन्ती कनकगिरिगुहागण्डशैलात् स्खलन्ती ।
क्षोणी पृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूर्निर्भरं भर्त्सयन्ती
पाथोधिं पूरयन्ती सुरनगरसरित् पावनी नः पुनातु ॥ ३॥
मज्जन्मातङ्गकुम्भच्युतमदमदिरामोदमत्तालिजालं
स्नानैः सिद्धाङ्गनानां कुचयुगविगलत् कुङ्कुमासङ्गपिङ्गम् ।
सायम्प्रातर्मुनीनां कुशकुसुमचयैः छन्नतीरस्थनीरं
पायान्नो गाङ्गमम्भः करिकलभकराक्रान्तरंहस्तरङ्गम् ॥ ४॥
आदावादि पितामहस्य नियमव्यापारपात्रे जलं
पश्चात् पन्नगशायिनो भगवतः पादोदकं पावनम् ।
भूयः शम्भुजटाविभूषणमणिः जह्नोर्महर्षेरियं
कन्या कल्मषनाशिनी भगवती भागीरथी दृश्यते ॥ ५॥
शैलेन्द्रात् अवतारिणी निजजले मज्जत् जनोत्तारिणी
पारावारविहारिणी भवभयश्रेणी समुत्सारिणी ।
शेषाहेरनुकारिणी हरशिरोवल्लीदलाकारिणी
काशीप्रान्तविहारिणी विजयते गङ्गा मनोहारिणी ॥ ६॥
कुतो वीचिर्वीचिस्तव यदि गता लोचनपथं
त्वमापीता पीताम्बरपुरनिवासं वितरसि ।
त्वदुत्सङ्गे गङ्गे पतति यदि कायस्तनुभृतां
तदा मातः शातक्रतवपदलाभोऽप्यतिलघुः ॥ ७॥
गङ्गे त्रैलोक्यसारे सकलसुरवधूधौतविस्तीर्णतोये
पूर्णब्रह्मस्वरूपे हरिचरणरजोहारिणि स्वर्गमार्गे ।
प्रायश्चित्तं यदि स्यात् तव जलकणिका ब्रह्महत्यादिपापे
कस्त्वां स्तोतुं समर्थः त्रिजगदघहरे देवि गङ्गे प्रसीद ॥ ८॥
मातर्जाह्नवी शम्भुसङ्गमिलिते मौलौ निधायाञ्जलिं
त्वत्तीरे वपुषोऽवसानसमये नारायणाङ्घ्रिद्वयम् ।
सानन्दं स्मरतो भविष्यति मम प्राणप्रयाणोत्सवे
भूयात् भक्तिरविच्युता हरिहराद्वैतात्मिका शाश्वती ॥ ९॥
गङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् प्रयतो नरः ।
सर्वपापविनिर्भुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १०॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादस्यशिष्या
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ गङ्गाष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

लाभ

  • धार्मिक मान्यता के अनुसार गंगा स्मरण से पापों की शुद्धि होती है।
  • मन को शांति और आत्मिक शुद्धि का अनुभव होता है।
  • घर में गंगा जल रखने और स्नान में मिलाने की परंपरा शुभ मानी जाती है।
  • तर्पण और श्राद्ध के समय गंगा स्मरण करने की परंपरा है।

गंगा की उपासना करने वाले भक्त गायत्री चालीसा भी पढ़ते हैं। जल और स्नान से जुड़ी पूजा के लिए सूर्य चालीसा और सूर्य अर्घ्य विधि भी उपयोगी हैं।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।