हर सुबह जो पहला दर्शन संसार को मिलता है, वह भगवान सूर्य का ही होता है। सूर्य ही तो हैं जो अंधकार को हटाकर दिन लाते हैं, ऋतुओं को बदलते हैं और हर प्राणी को जीवन की ऊर्जा देते हैं। इसीलिए भारतीय परंपरा में सूर्य की उपासना को दैनिक जीवन का अंग माना गया है — सुबह जल का अर्घ्य, सूर्य नमस्कार और सूर्य के स्तोत्रों का पाठ। इन्हीं स्तोत्रों में से एक है सूर्याष्टकम, जो आठ श्लोकों में सूर्य देव की स्तुति करता है।

सूर्याष्टकम

सूर्याष्टकम आठ श्लोकों में भगवान सूर्य की स्तुति करने वाला सरल स्तोत्र है। इसके हर श्लोक में सूर्य के किसी न किसी रूप या गुण का वर्णन है — उनका स्वर्णिम रंग, उनका रथ, उनके सात घोड़े, उनकी ऊर्जा और उनका अंधकार का नाश। यह अष्टक उन भक्तों के लिए सुगम है, जो सूर्य की आराधना को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहते हैं। सरल भाषा में लिखा यह स्तोत्र जप और गायन दोनों में पढ़ा जा सकता है।

चुनिंदा श्लोक

जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥

इस श्लोक में भक्त सूर्य का ध्यान करता है। इसका भाव यह है — जो जपा (गुड़हल) के फूल के समान रंग वाला है, जो कश्यप ऋषि के पुत्र हैं, जो महान प्रकाश से युक्त हैं, जो अंधकार के शत्रु हैं और सभी पापों का नाश करने वाले हैं — उस दिवाकर (दिन को बनाने वाले) सूर्य को मैं प्रणाम करता हूँ। यह श्लोक सूर्य ध्यान का प्रारंभिक रूप है, जो पाठ की शुरुआत में मन को सूर्य की ओर केंद्रित करता है।

सूर्य गायत्री

ॐ सूर्याय विद्महे भास्कराय धीमहि। तन्नो आदित्यः प्रचोदयात्॥

यह सूर्य की गायत्री है, जो मूल गायत्री मंत्र के ही स्वरूप में सूर्य को समर्पित है। इसका भाव यह है — हम सूर्य को जानते हैं, भास्कर के रूप में ध्यान करते हैं, और वही आदित्य हमारी बुद्धि को सद्मार्ग पर प्रेरित करें। सूर्य गायत्री का जप सूर्य की ऊर्जा से जुड़ने और मन को प्रकाश की ओर ले जाने का माध्यम माना गया है।

पाठ विधि

सूर्याष्टकम के पाठ की परंपरागत विधि इस प्रकार है:

  • रविवार को सुबह स्नान करके पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करें।
  • सूर्य को अर्घ्य देकर फिर स्तोत्र का पाठ शुरू करें।
  • पाठ से पहले जपाकुसुम संकाशं वाला ध्यान श्लोक दोहराएँ।
  • सूर्य गायत्री का जप पाठ के बाद भी किया जा सकता है।

सूर्याष्टकम् का पूर्ण पाठ

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
साम्ब उवाच ॥
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥ १॥
सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् ।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ २॥
लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ३॥
त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्माविष्णुमहेश्वरम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ४॥
बृंहितं तेजःपुञ्जं च वायुमाकाशमेव च ।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ५॥
बन्धूकपुष्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम् ।
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ६॥
तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ७॥
तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ८॥
सूर्याष्टकं पठेन्नित्यं ग्रहपीडाप्रणाशनम् ।
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान्भवेत् ॥ ९॥
आमिशं मधुपानं च यः करोति रवेर्दिने ।
सप्तजन्म भवेद्रोगी प्रतिजन्म दरिद्रता ॥ १०॥
स्त्रीतैलमधुमांसानि यस्त्यजेत्तु रवेर्दिने ।
न व्याधिः शोकदारिद्र्यं सूर्यलोकं स गच्छति ॥ ११॥
इति श्रीसूर्याष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

लाभ

मान्यता है कि सूर्याष्टकम का नियमित पाठ आरोग्य और ऊर्जा की कामना को पूरा करता है। सूर्य को आरोग्य के देवता के रूप में भी पूजा जाता है, इसीलिए इस स्तोत्र का संबंध स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है। परंपरा में सूर्य ग्रहण के समय स्नान और इस स्तोत्र के पाठ को भी विशेष माना गया है। सूर्य की उपासना भक्त को प्रकाश, साहस और सकारात्मकता देती है — यही इस अष्टक का गहरा संदेश है।

सूर्य की पूर्ण भक्ति के लिए सूर्य चालीसा का पाठ करें। सुबह के अर्घ्य की सही विधि सूर्य अर्घ्य विधि में समझी जा सकती है, और गायत्री मंत्र के साथ जुड़ने के लिए गायत्री चालीसा पढ़ें।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।