वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में एक ऐसा प्रसंग आता है, जिसके बिना राम-रावण युद्ध का चरम अधूरा माना जा सकता है। रावण से घायल होकर जब श्रीराम मुश्किल में थे, तब महर्षि अगस्त्य उनके पास पहुँचे और उन्हें एक गोपनीय स्तोत्र का उपदेश दिया — यही स्तोत्र आदित्य हृदय कहलाता है। इसके उपदेश के बाद श्रीराम ने सूर्य देव का ध्यान करके विजय प्राप्त की। यह प्रसंग बताता है कि यह स्तोत्र विजय और आत्मबल का मंत्र माना जाता है।

आदित्य हृदय स्तोत्र

आदित्य हृदय स्तोत्र भगवान सूर्य की महिमा का वर्णन करने वाला स्तोत्र है। आदित्य सूर्य का ही नाम है, और हृदय का अर्थ है सार अथवा मूल। यानी यह स्तोत्र सूर्य की महिमा का हृदय अर्थात् सार है। इसमें सूर्य को ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवताओं का स्वरूप बताया गया है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार इसे अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को सिखाया, इसीलिए इसे श्रीराम से जुड़ा हुआ स्तोत्र भी माना जाता है।

ध्यान श्लोक

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः। केयूरवान्मकरकुण्डलवान्किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥

इस ध्यान श्लोक का भाव यह है — सूर्यमंडल के मध्य में जो नारायण विराजमान हैं, जिनका आसन कमल है, जो बाजूबंद, मकराकृति कुंडल और मुकुट धारण किए हैं, जिनके गले में हार है, जिनका शरीर स्वर्ण जैसा चमकीला है और जिनके हाथ में शंख-चक्र है — उन्हीं का सदा ध्यान करना चाहिए। इस श्लोक में सूर्य और विष्णु का भाव एक हो जाता है — सूर्य का प्रकाश और नारायण का स्वरूप एक ही माने गए हैं।

स्तोत्र का महत्व

आदित्य हृदय स्तोत्र का महत्व इसके रचना-काल से ही जुड़ा है। जिस प्रकार युद्ध से पहले श्रीराम को यह स्तोत्र सिखाया गया, उसी प्रकार इसे संकट के समय का आत्मबल कहा जा सकता है। सूर्य को जगत का जीवनदाता माना गया है — उसी से दिन होता है, ऋतुएँ बदलती हैं और जीवन चलता है। इस स्तोत्र का पाठ भक्त को सूर्य के इसी सर्वव्यापी स्वरूप से जोड़ता है।

जप विधि

आदित्य हृदय स्तोत्र के जप की सामान्य विधि यह है:

  • रविवार को सुबह स्नान करके सूर्य की ओर मुख करके पाठ करें।
  • ताँबे के पात्र से जल चढ़ाकर सूर्य को अर्घ्य देना पारंपरिक माना जाता है।
  • पाठ से पहले उपरोक्त ध्यान श्लोक को मन ही मन दोहराएँ।
  • यदि रविवार संभव न हो, तो किसी भी दिन सूर्योदय के समय पाठ किया जा सकता है।

फल श्लोक

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्। जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शुभम्॥

यह फल श्लोक बताता है कि यह आदित्य हृदय स्तोत्र पुण्यदायी है, सभी शत्रुओं का नाश करने वाला है, विजय देने वाला है। जो व्यक्ति इसे नित्य जपता है, उसे यह अक्षय (कभी समाप्त न होने वाला) और परम शुभ फल देता है। इसी फल के विश्वास के साथ भक्त इसे नियमित पाठ में रखते हैं।

सूर्य उपासना की इस परंपरा के साथ सूर्य चालीसा का पाठ भी हो सकता है। सूर्य को जल अर्पित करने की विधि सूर्य अर्घ्य विधि में देखें, और श्रीराम की भक्ति के लिए राम चालीसा पढ़ें।

आदित्य हृदय स्तोत्र का पूर्ण पाठ

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ १॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः ॥ २॥
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि ॥ ३॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपेन्नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥ ४॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम् ॥ ५॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥ ६॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥ ७॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥ ८॥
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥ ९॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥ १०॥
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ॥ ११॥
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः ।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥ १२॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथी प्लवङ्गमः ॥ १३॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः ।
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥ १४॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ॥ १५॥
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥ १६॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥ १७॥
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥ १८॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥ १९॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥ २०॥
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥ २१॥
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ २२॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥ २३॥
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥ २४॥
॥ फलश्रुतिः ॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ २५॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥ २६॥
अस्मिन्क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि ।
एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥ २७॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥ २८॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥ २९॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् ।
सर्व यत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥ ३०॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।
निशिचरपतिसङ्क्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥ ३१॥
इति आदित्यहृदयं मन्त्रम् ॥

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।