शिव मंदिरों में शिवलिंग ही आराधना का केंद्र होता है — वही निराकार का साकार प्रतीक, जिस पर भक्त जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करते हैं। शिवलिंग की अर्चना सदियों से चली आ रही है, और इसी अर्चना को शब्दों में बाँधने वाला सुंदर स्तोत्र है लिंगाष्टकम। इसके आठ श्लोक शिवलिंग के रूप में सदाशिव की स्तुति करते हैं, और हर श्लोक में उस शिवलिंग को प्रणाम करने का भाव है जो सृष्टि के आरंभ से परे है।

लिंगाष्टकम

लिंगाष्टकम में शिवलिंग की आठ श्लोकों में स्तुति की गई है। इसमें शिवलिंग को देवताओं द्वारा पूजित, निर्मल प्रकाश से शोभायमान और जन्म-जन्म के दुःखों का नाश करने वाला बताया गया है। हर श्लोक के अंत में भक्त सदाशिव शिवलिंग को प्रणाम करता है — यह आवर्तन स्तोत्र को जप जैसा बना देता है। इस अष्टक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सीधे शिवलिंग से जुड़ा है, जिससे भक्त पूजा के दौरान भी इसे गुनगुना सकता है।

प्रथम श्लोक

ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिङ्गं निर्मलभासित शोभित लिङ्गम्। जन्मजदुःखविनाशक लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्॥

इस श्लोक का भाव यह है — जिस शिवलिंग को ब्रह्मा, विष्णु (मुरारि) और सभी देवता पूजते हैं; जो निर्मल प्रकाश से शोभायमान है; जो जन्म से उत्पन्न दुःखों का विनाश करता है — उस सदाशिव शिवलिंग को मैं प्रणाम करता हूँ। यह श्लोक शिवलिंग की सर्वोच्च स्थिति को बताता है — सृष्टि के रचयिता, पालनकर्ता और देवताओं के द्वारा भी पूजित।

शिवलिंग पूजा से संबंध

शिवलिंग पूजा में भक्त अनेक वस्तुएँ अर्पित करता है — जल, दूध, दही, घी, शहद, बेलपत्र, धतूरा, भांग और फूल। लिंगाष्टकम का पाठ इन्हीं अर्पणों के बीच किया जाता है। पूजा के समय जब भक्त शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाता है, उसी समय अष्टक का पाठ करना परंपरा का हिस्सा है। इससे पूजा में भाव का संग मिलता है — बाहरी अर्पण और भीतरी स्तुति दोनों एक साथ होती हैं।

पाठ विधि

लिंगाष्टकम के पाठ के लिए कोई विशेष सामग्री आवश्यक नहीं है। सामान्य विधि यह है:

  • सुबह स्नान करके शिवलिंग या शिवजी की मूर्ति के समक्ष बैठें।
  • सोमवार और महाशिवरात्रि के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
  • पाठ से पहले शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पण कर सकते हैं।
  • पाठ के अंत में शिवजी की आरती करें।

लिंगाष्टकम् का पूर्ण पाठ

ब्रह्ममुरारी सुरार्चित लिङ्गं । निर्मल भासित शोभित लिङ्गं । जन्मज दुःख विनाशक लिङ्गं । तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गं ॥ १ ॥
देवमुनि प्रवारार्चित लिङ्गं । कामदहन करुणाकर लिङ्गं । रावण दर्प विनाशक लिङ्गं । तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गं ॥ २ ॥
सर्व सुगन्ध सुलेपित लिङ्गं । बुद्धी विवर्धन कारण लिङ्गं । सिद्ध सुरासुर वंदित लिङ्गं । तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गं ॥ ३ ॥
कनक महामणि भूषित लिङ्गं । फणिपति वेष्टित शोभित लिङ्गं । दक्ष सुयज्ञ विनाशन लिङ्गं । तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गं ॥ ४ ॥
कुमकुम चंदन लेपित लिङ्गं । पंकज हार सुशोभित लिङ्गं । संचित पाप विनाशक लिङ्गं । तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गं ॥ ५ ॥
देवागणार्चित सेवित लिङ्गं । भावै-र्भक्तिभिरेव च लिङ्गं । दिनकर कोटी प्रभाकर लिङ्गं । तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गं ॥ ६ ॥
अष्टोदलोपरीवेष्टित लिङ्गं । सर्वसमुद्भव कारण लिङ्गं । अष्टदरिद्र विनाशन लिङ्गं । तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गं ॥ ७ ॥
सुरगुरु सुरवर पूजित लिङ्गं । सुरवन पुष्प सदार्चित लिङ्गं । परात्पर परामात्मक लिङ्गं । तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गं ॥ ८ ॥
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेश्शिव संनिधौ । शिवलोकमवाप्नोती शिवेन सह मोदिते ॥

लाभ

मान्यता है कि लिंगाष्टकम का नियमित पाठ कष्टों को दूर करता है और जीवन में सुख-शांति लाता है। शिवलिंग के प्रति भक्ति बढ़ने से मन में धैर्य और संयम आता है। शिवभक्तों के लिए यह अष्टक एक सरल मार्ग है — जो शिवलिंग के दर्शन करते हों, वे पूजा के बीच इस अष्टक को भी स्थान दे सकते हैं।

शिवभक्ति के सरल रूप के लिए शिव चालीसा का पाठ करें। शिव के मंगलमय रूप की स्तुति मंगल चालीसा में है, और तांडव के रौद्र भाव के लिए शिव तांडव स्तोत्र पढ़ें।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।