भक्ति-कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी रचनाओं में अनेक रूपों में भगवान का गुणगान किया। रामचरितमानस के अतिरिक्त उनके द्वारा रचित स्तोत्रों में रुद्राष्टकम विशेष स्थान रखता है। यह वही अष्टक है जिसे मानस के सुंदरकांड में शिवजी की स्तुति के रूप में पढ़ा जाता है — पर यहाँ इसे अलग से, स्वतंत्र पाठ के रूप में भी जाना जाता है। तुलसीदास जी के इस भक्ति-स्वर में शिव के रौद्र और करुण दोनों रूपों की झलक मिलती है।

रुद्राष्टकम

रुद्राष्टकम आठ श्लोकों में शिव का वर्णन करने वाला स्तोत्र है। रुद्र शिव का ही एक नाम है, और अष्टक का अर्थ है आठ। प्रत्येक श्लोक में शिव के किसी न किसी रूप, गुण या स्थिति का चित्रण है — कहीं वे दिगम्बर योगी हैं तो कहीं सृष्टि के पालनकर्ता। तुलसीदास जी ने इसमें सरल भाषा में गहरे अध्यात्म को रखा है, जिससे कोई भी भक्त आसानी से समझ सके कि शिव कौन हैं।

प्रथम श्लोक

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥

इस प्रथम श्लोक में भक्त ईशान स्वरूप शिव को प्रणाम करता है। इसका भाव यह है — मैं उस ईश्वर को नमन करता हूँ, जो निर्वाण रूप है, अर्थात् मुक्ति का स्वरूप है; जो सर्वव्यापक और सब जगह व्याप्त है; जो ब्रह्म और वेद दोनों का स्वरूप है। शिव को यहाँ निर्गुण, निर्विकल्प (जिसमें कोई भेद नहीं) और निरीह (कामना से रहित) कहा गया है। वे चिदाकाश हैं — चेतना का आकाश, और आकाश में ही वास करते हैं। इस श्लोक से स्तोत्र की शुरुआत में ही शिव की सर्वोच्च स्थिति का परिचय मिल जाता है।

अष्टक का भाव

रुद्राष्टकम के आगे के श्लोक इसी भाव को आगे बढ़ाते हैं। शिव को जटाधारी, नीलकंठ, गंगा और चंद्र को धारण करने वाला, सर्पों से विभूषित, त्रिशूल-डमरू धारण किए हुए, भस्म से लेपित रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही उन्हें हिमालय पर ध्यानस्थ बैठे योगी और गौरी के प्रियतम के रूप में भी दिखाया गया है। इस प्रकार इस अष्टक में शिव की समग्र छवि — रौद्र भी और सौम्य भी — एक साथ सामने आती है।

पाठ विधि

रुद्राष्टकम के पाठ की सरल विधि यह है:

  • स्नान करके साफ वस्त्र पहनें और शिवजी का स्मरण करें।
  • पाठ के समय गंगाजल छिड़क कर शुद्ध स्थान पर बैठें।
  • महाशिवरात्रि और प्रदोष के दिन इस अष्टक का पाठ विशेष माना जाता है।
  • सोमवार के व्रत के साथ इसका पाठ करने की भी परंपरा है।

रुद्राष्टकम् का पूर्ण पाठ

॥ श्रीरुद्राष्टकम् ॥
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् । निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥ १ ॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् । करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ॥ २ ॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् । स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥ ३ ॥
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् । मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ ४ ॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् । त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ ५ ॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी । चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ ६ ॥
न यावत् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् । न तावत् सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥ ७ ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् । जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥ ८ ॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये । ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥
॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥

लाभ

रुद्राष्टकम के नियमित पाठ से मन की शांति बढ़ती है और मन के भय, चिंता दूर होते हैं। यह स्तोत्र भक्त को शिव की शरण में रखता है, जिससे जीवन में संकट के समय आत्मबल मिलता है। जो भक्त इसे सच्चे भाव से पढ़ता है, उसके मन में रौद्र भाव शांत होते हैं और करुणा बढ़ती है।

शिव की सरल भक्ति के लिए शिव चालीसा का पाठ किया जा सकता है, और शिव के तांडव रूप की महिमा जानने के लिए शिव तांडव स्तोत्र देखें। गायत्री की साधना में रुचि हो तो गायत्री चालीसा भी साथ में पढ़ी जा सकती है।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।