लक्ष्मी नरसिंह करावलंब स्तोत्र — शरणागति की स्तुति

करावलंब का अर्थ है — हाथ का सहारा, आश्रय, सहारा। जब कोई छोटा बच्चा गिरने लगता है तो माता-पिता का हाथ उसे थाम लेता है। उसी भाव से यह स्तोत्र लक्ष्मी-नरसिंह भगवान से प्रार्थना करता है कि जीवन के संकटों में आपका ही हाथ हमारा सहारा बने। 'करावलंब' शब्द में ही इस स्तोत्र का संपूर्ण भाव छिपा है — शरणागति, अर्थात स्वयं को पूर्णतः भगवान के सहारे समर्पित कर देना।

लक्ष्मी-नरसिंह स्वरूप

नरसिंह भगवान विष्णु के अवतार हैं, और लक्ष्मी उनकी शक्ति हैं। लक्ष्मी-नरसिंह के रूप में भगवान को सौम्य और भयहारी दोनों स्वरूपों में देखा जाता है — लक्ष्मी सौम्यता और ऐश्वर्य की देवी हैं, जबकि नरसिंह भय के नाशक हैं। इस प्रकार यह स्वरूप भक्त के लिए दोनों प्रकार के वरदान देने वाला माना जाता है — एक ओर भय और संकट दूर होते हैं, दूसरी ओर शांति और ऐश्वर्य की कामना पूर्ण होती है। यह रूप विशेष रूप से उन भक्तों की उपासना में प्रचलित है जो आपदा के समय मानसिक धैर्य और आश्रय की खोज में होते हैं।

इस स्तोत्र की विशेषता

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लक्ष्मी और नरसिंह दोनों की एक साथ उपासना होती है। मान्यता है कि जहां लक्ष्मी जी का वास होता है, वहां समृद्धि होती है, और जहां नरसिंह भगवान का स्मरण होता है, वहां भय का भवन नहीं होता। इस प्रकार यह स्तोत्र भक्त को आर्थिक संकट और मानसिक भय — दोनों से राहत की कामना करने का माध्यम है।

शरणागति के भाव

इस स्तोत्र में भक्त अपनी समस्त शक्ति को त्यागकर भगवान के चरणों की शरण लेता है। भाव यह होता है — 'हे प्रभु, मैं आपके हाथों का सहारा लेता हूं, मुझे संभाल लीजिए।' यह भाव ही भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप माना गया है, जहां व्यक्ति अपने प्रयास करता है, किंतु परिणाम भगवान पर छोड़ देता है। आपदा के समय यह स्तोत्र भक्त को साहस और धैर्य देता है, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि लक्ष्मी-नरसिंह उसके साथ हैं।

गायत्री श्लोक

इस स्तोत्र के अंतर्गत लक्ष्मी और नरसिंह दोनों की गायत्री छंद में उपासना होती है —

ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुपत्न्यै धीमहि। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥

अर्थ — ॐ, हम महालक्ष्मी को जानते हैं, विष्णु की पत्नी का ध्यान करते हैं; वह लक्ष्मी हमें प्रेरित करें। यानी यह गायत्री महालक्ष्मी के ऐश्वर्यमय स्वरूप का ध्यान कराती है।

ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो नृसिंहः प्रचोदयात्॥

अर्थ — ॐ, हम नरसिंह को जानते हैं, वज्र के समान कठोर नखों वाले का ध्यान करते हैं; वह नरसिंह हमें प्रेरित करें। यह गायत्री नरसिंह भगवान के भयहारी रूप की उपासना है।

पाठ विधि

गुरुवार और शुक्रवार का दिन इस स्तोत्र के पाठ के लिए विशेष माना जाता है। संध्या के समय दीपक और धूप के साथ पाठ करने की परंपरा बताई गई है। प्रातः स्नान के बाद भी पाठ किया जा सकता है। पाठ से पहले लक्ष्मी-नरसिंह का ध्यान करें, फिर गायत्री श्लोकों का जप करें और स्तोत्र का पाठ करें। आपदा के समय इस स्तोत्र को मन में श्रद्धा और धैर्य के साथ बार-बार पढ़ने की प्रेरणा दी गई है।

लक्ष्मी जी की उपासना के लिए लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें। नरसिंह को विष्णु का अवतार मानते हुए विष्णु चालीसा का पाठ भी उपयुक्त है। गहन उपासना के इच्छुक भक्त विष्णु सहस्रनाम का अध्ययन भी कर सकते हैं।

लक्ष्मी नरसिंह करावलंब स्तोत्र का पूर्ण पाठ

श्रीमत्पयोनिधिनिकेतनचक्रपाणे भोगीन्द्रभोगमणिराजितपुण्यमूर्ते । योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १ ॥
ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटिसङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त । लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २ ॥
संसारदावदहनाकरभीकरोरुज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य । त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ३ ॥
संसारजालपतितस्य जगन्निवास सर्वेन्द्रियार्थबडिशाग्रझषोपमस्य । प्रोत्कम्पितप्रचुरतालुकमस्तकस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ४ ॥
संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य । दीनस्य देव कृपया पदमागतस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ५ ॥
संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघातनिष्पीड्यमानवपुषः सकलार्तिनाश । प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ६ ॥
संसारसर्पविषदग्धमहोग्रतीव्रदंष्ट्राग्रकोटिपरिदष्टविनष्टमूर्तेः । नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ७ ॥
संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्मशाखायुतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम् । आरुह्य दुःखफलितं पततो दयालो [चकितं] लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ८ ॥
संसारसागरविशालकरालकालनक्रग्रहग्रसितनिग्रहविग्रहस्य । व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनिपीडितस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ९ ॥
संसारसागरनिमज्जनमुह्यमानं दीनं विलोकय विभो करुणानिधे माम् । प्रह्लादखेदपरिहारपरावतार लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १० ॥
संसारघोरगहने चरतो मुरारे मारोग्रभीकरमृगप्रचुरार्दितस्य । आर्तस्य मत्सरनिदाघसुदुःखितस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ११ ॥
बद्ध्वा गले यमभटा बहुतर्जयन्तः कर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युतं माम् । एकाकिनं परवशं चकितं दयालो लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १२ ॥
लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप । ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १३ ॥
एकेन चक्रमपरेण करेण शङ्खमन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन् । वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नं लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १४ ॥
अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य चोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेयैः । मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १५ ॥
प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीकव्यासादिभागवतपुङ्गवहृन्निवास । भक्तानुरक्तपरिपालनपारिजात लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १६ ॥
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण । ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्तास्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम् ॥ १७ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं श्रीलक्ष्मीनृसिंह करावलम्ब स्तोत्रम् ।
— अधिकश्लोकाः —
संसारयोग सकलेप्सितनित्यकर्म सम्प्राप्यदुःख सकलेन्द्रियमृत्युनाश । सङ्कल्प सिन्धुतनयाकुच कुङ्कुमाङ्क लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १८ ॥
आद्यन्तशून्यमजमव्ययमप्रमेयं आदित्यरुद्रनिगमादिनुतप्रभावम् । अम्भोधिजास्य मधुलोलुप मत्तभृङ्ग लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १९ ॥
वाराह राम नरसिंह रमादिकान्ता क्रीडाविलोल विधिशूलि सुरप्रवन्द्य । हंसात्मकं परमहंस विहारलीलं लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २० ॥
माता नृसिंहश्च पिता नृसिंहः भ्राता नृसिंहश्च सखा नृसिंहः । विद्या नृसिंहो द्रविणं नृसिंहः लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २१ ॥
प्रह्लाद मानस सरोज विहारभृङ्ग गङ्गातरङ्ग धवलाङ्ग रमास्थिताङ्क । शृङ्गार सुन्दर किरीट लसद्वराङ्ग लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २२ ॥
श्रीशङ्करार्य रचितं सततं मनुष्यः स्तोत्रं पठेदिहतु सत्वगुणप्रसन्नम् । सद्योविमुक्त कलुषो मुनिवर्य गण्यो लक्ष्मी पदमुपैति सनिर्मलात्मा ॥ २३ ॥
यन्माययोर्जितः वपुः प्रचुर प्रवाह मग्नार्थ मत्रनिवहोरु करावलम्बम् । लक्ष्मीनृसिंह चरणाब्ज मधुव्रतेन स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण ॥ २४ ॥
श्रीमन्नृसिंह विभवे गरुडध्वजाय तापत्रयोपशमनाय भवौषधाय । तृष्णादि वृश्चिक जलाग्नि भुजङ्ग रोग क्लेशापहाय हरये गुरवे नमस्ते ॥ २५ ॥
इति श्रीलक्ष्मीनृसिंह करावलम्ब स्तोत्रम् ।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।