भवानी अष्टकम — शरणागति का अष्टक

किसी भी शरणागत भक्त के हृदय में एक क्षण ऐसा आता है, जब दुनिया की हर आशा टूटती नजर आती है। तब उसकी आँखें केवल एक ही ओर उठती हैं — माँ भवानी की ओर। भवानी अष्टकम उसी क्षण की भाषा है। यह कहता है कि न मेरा कोई पिता है, न माता, न बंधु, न दाता — एकमात्र माँ भवानी ही मेरी शरण हैं। यह आठ श्लोकों की वह स्तुति है, जो पूर्ण समर्पण के भाव से माँ के चरणों में अपना सब कुछ रख देती है।

भवानी अष्टकम

भवानी माँ पार्वती और शक्ति के रूपों में से एक प्रिय नाम है। जहां माँ शिव की अर्धांगिनी और जगत की जननी के रूप में स्मरण की जाती हैं, वहां उन्हें भवानी कहा जाता है। भवानी अष्टकम में इसी माँ की शरण में जाने की बात है। यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य की परंपरा से जोड़ा जाता है, जिन्होंने भक्ति के अनेक गीतों में शरणागति का भाव गाया है। इस अष्टकम में कहीं जटिल तंत्र-मंत्र नहीं, केवल बालक के समान निर्मल विश्वास है।

शरणागति का भाव

शरणागति का अर्थ है अपने पूर्ण समर्पण को स्वीकार करना। भवानी अष्टकम की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें भक्त कोई मांग नहीं रखता, बल्कि केवल माँ की शरण में रहने की बात करता है। वह अपनी कमजोरी, अपने अभाव और अपनी निराशा को माँ के सामने रखता है और यह मान लेता है कि माँ के अतिरिक्त उसका कोई संबल नहीं। यही भाव इस स्तोत्र को केवल स्तुति नहीं, बल्कि विश्वास का दस्तावेज बनाता है।

प्रसिद्ध श्लोक

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता। न जातो न जन्मी न दासो न दासी भवानीनामान्येव शरणं मम॥

इस श्लोक का पूर्ण भाव यह है — न मेरा पिता है, न माता, न भाई, न दाता; न पुत्र, न पुत्री, न सेवक, न स्वामी; मैं न अपने कुल के कारण जाना जाता हूँ और न ही जन्म के कारण, न दास के रूप में और न दासी के रूप में। अर्थात मेरी कोई अन्य पहचान नहीं, केवल भवानी ही मेरी शरण हैं। सरल भाषा में — जब संसार से कोई सहारा नहीं, तब माँ भवानी का नाम ही मेरा सहारा है।

कब पढ़ें

भवानी अष्टकम के लिए मंगलवार और शुक्रवार का विशेष महत्व माना जाता है। मंगलवार शक्ति का दिन है और शुक्रवार माँ की कृपा का दिन। संकट और निराशा के क्षणों में इस अष्टकम का पाठ करने से मन में धैर्य लौटता है। जो भक्त लंबे समय से किसी कठिनाई में है, उसके लिए नियमित पाठ की मान्यता है। रात्रि में सोने से पहले इसे पढ़ना भी शांति देता है।

भवानी अष्टकम् का पूर्ण पाठ

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता। न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१॥
भवाब्धावपारे महादुःखभीरु पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः। कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥२॥
न जानामि दानं न च ध्यानयोगं न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्। न जानामि पूजां न च न्यासयोगम् गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥३॥
न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्। न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥४॥
कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः। कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहम् गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥५॥
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्। न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥६॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये। अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥७॥
अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः। विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहम् गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥८॥

लाभ

  • संकट और निराशा के समय धैर्य और साहस मिलता है।
  • मन में माँ के प्रति अटूट विश्वास जागता है।
  • मानसिक पीड़ा और अकेलेपन का भाव कम होता है।
  • पूर्ण शरणागति के भाव से माँ की कृपा प्राप्त होती है।

भवानी अष्टकम के साथ दुर्गा चालीसा और काली चालीसा का पाठ उत्तम रहता है। भक्ति में शक्ति और बुद्धि दोनों चाहने वाले गायत्री चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं।

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।