देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र — क्षमा याचना का पाठ

हर भक्त के हृदय में एक गहरी पीड़ा होती है — जब वह देखता है कि उसने माँ की आराधना में कितनी उपेक्षा की, कितने नियम भंग किए। पूजा करना जानता है तो ध्यान नहीं; ध्यान करता है तो सही शब्दों का ज्ञान नहीं। इसी विनम्रता के क्षण में भक्त माँ के सम्मुख झुककर कहता है कि माँ, मुझे मंत्र भी नहीं आता, यंत्र भी नहीं, मैं तो बस आपकी शरण में हूँ। यही विनम्रता देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र का आधार है।

अपराध क्षमापन क्यों

हममें से प्रत्येक की आराधना में कोई न कोई त्रुटि रह ही जाती है। कभी मन विचलित रहता है, कभी नियम-संयम का पालन नहीं होता, तो कभी जल्दबाजी में पूजा अधूरी रह जाती है। परंपरा में माना गया है कि पूजा के अंत में यदि भक्त सच्चे मन से अपनी त्रुटियों की क्षमा मांग ले, तो वह पूजा संपूर्ण हो जाती है। देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र इसी क्षमा याचना का पाठ है, जो भक्त को अहंकार से मुक्त कर उसे माँ के चरणों के और निकट ले आता है।

स्तोत्र का भाव

इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें कोई मांग नहीं है, कोई साधना का दंभ नहीं है। यह तो मात्र माँ के सामने अपनी सारी कमियाँ रखने का साहस है। भक्त कहता है कि मैं यह दावा नहीं करता कि मैंने बहुत पूजा की, मैं तो बस यह जानता हूँ कि आपके बिना मेरा कोई आधार नहीं। यह श्लोक अहंकार शून्य भक्ति की पराकाष्ठा है, जिसमें भक्त स्वयं को पूर्णतः माँ की इच्छा पर छोड़ देता है।

प्रसिद्ध श्लोक

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिक्रमम्। न जाने पुष्पाणां गणनमपि न जाने बलिमहं न जाने क्षमापनं प्रार्थनाविधिम्॥

इस श्लोक का भाव स्पष्ट है — हे माँ, मुझे न मंत्र आता है, न यंत्र; न स्तुति का क्रम, न ध्यान का विधान; न पुष्पों की गणना, न बलि देने का तरीका; न क्षमा याचना की प्रार्थना विधि। मैं तो केवल यह जानता हूँ कि आप ही मेरी शरण हैं। अर्थात भक्त का विश्वास है कि माँ को शब्दों से नहीं, भाव से पहचानी जाती हैं।

कब पढ़ें

इस स्तोत्र के पाठ की कोई नियत समय सीमा नहीं है, परंतु परंपरा में इसे रात्रि के समय अथवा नवरात्रि के अंतिम दिन पढ़ने की विशेष मान्यता है। नवरात्रि समापन पर जब कलश विसर्जन होता है, तब माँ से समस्त त्रुटियों की क्षमा मांगते हुए यह पाठ किया जाता है। जो भक्त प्रतिदिन सोने से पहले इसे पढ़ता है, उसका मन हल्का हो जाता है और वह निर्भीक होकर अगले दिन का आरंभ करता है।

विधि

माँ दुर्गा या अपनी कुलदेवी के सम्मुख दीप जलाकर श्रद्धा से बैठें। मन को शांत करके अपने सभी अपराधों को माँ के चरणों में रखते हुए इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के बाद माँ से प्रार्थना करें कि मेरे अज्ञानता के कारण हुए अपराधों को क्षमा करें और मुझे अपनी शरण में रखें। पाठ करते समय भाव ही प्रमुख है, शब्दों की शुद्धता से अधिक।

इस क्षमा याचना के साथ दुर्गा चालीसा और काली चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं। नवरात्रि के दौरान पूर्ण आयोजन के लिए दुर्गा पूजा विधि देखें।

देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र का पूर्ण पाठ

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः । न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १॥
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् । तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २॥
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः । मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३॥
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया । तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४॥
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि । इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५॥
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः । तवापर्णे कर्णे विशति मनु वर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जननीयं जपविधौ ॥ ६॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः । कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७॥
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः । अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८॥
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः । श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ ९॥
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि । नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ १०॥
जगदम्ब विचित्र मत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि । अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ ११॥
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि । एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥ १२॥ ॐ ॥

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।