शीतला माता पूजा का विशेष महत्व आरोग्य और शीतलता की देवी के रूप में है। माता शीतला को बुखार, दाद, फोड़े-फुंसी जैसे रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। इनकी पूजा विशेषकर बसंत ऋतु (चैत्र कृष्ण अष्टमी के बाद) में की जाती है। इस लेख में शीतला माता पूजा की संपूर्ण विधि, सामग्री, मंत्र, भोग और नियम सरल भाषा में दिए गए हैं।

शीतला माता का महत्व

परंपरा में शीतला माता को रोग-निवारक देवी माना गया है। इनकी सवारी गधे पर मानी जाती है और इनके हाथों में सूप (सुप) एवं कलश होता है। मान्यता है कि शीतला माता की उपासना से शरीर शीतल रहता है और रोग-व्याधियों से बचाव होता है। इनका प्रसिद्ध पर्व शीतला अष्टमी (बसंत ऋतु में) है, जब घरों में बासी (सीतल) भोजन का प्रसाद बनाया जाता है।

शीतला माता की पूजा कब करें?

  • शीतला अष्टमी: चैत्र कृष्ण अष्टमी — प्रमुख पर्व।
  • मंगलवार/शनिवार: शीतला माता की पूजा के प्रचलित दिन।
  • रोग-मुक्ति हेतु: किसी भी शुभ दिन विशेष पूजा की जा सकती है।

शीतला माता पूजा की सामग्री

  • शीतला माता की मूर्ति/चित्र, आसन,
  • लाल वस्त्र, रोली, कुमकुम, सिंदूर, हल्दी,
  • अक्षत, चंदन, पुष्प, कलश (जल सहित),
  • नैवेद्य — बासी/सीतल भोजन (हलवा, पूड़ी), फल, मिश्री,
  • जौ (सफेद जौ) अर्पण हेतु,
  • धूप, दीप, कपूर, घंटी, शुद्ध जल।

शीतला माता पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — स्नान एवं संकल्प

प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर लाल वस्त्र बिछाकर माता की मूर्ति/चित्र स्थापित करें। पूजा का संकल्प करें:

मम उपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा शीतलामातृप्रीत्यर्थं
शीतलामातापूजनं करिष्ये।

चरण 2 — गणेश स्मरण

ॐ गं गणपतये नमः।

चरण 3 — शीतला माता का ध्यान-पूजन

माता का ध्यान करते हुए उपचार-अर्पण करें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पांजलि। प्रचलित प्रारूप:

ॐ श्री शीतलायै नमः [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम मंत्र में [उपचार] के स्थान पर बोलें।

चरण 4 — सीतल भोग का अर्पण

शीतला माता को बासी (सीतल) भोजन — जैसे ठंडा हलवा-पूड़ी, फल, मिश्री — का भोग लगाएँ। यह भोग शीतलता का प्रतीक माना गया है। अर्पण करते समय यह मंत्र बोलें:

ॐ शीतलायै विद्महे गर्दभवाहिन्यै धीमहि।
तन्नो देवी प्रचोदयात्॥

चरण 5 — देवी का मंत्र जप

ॐ श्री शीतलायै नमः।

चरण 6 — चालीसा पाठ एवं आरती

शीतला माता चालीसा का पाठ करें और माता की आरती करें। अंत में क्षमा-प्रार्थना करें:

आवाहनं न जानामि न जानामि तथार्चनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥

शीतला माता पूजा के नियम

  • शीतला अष्टमी के दिन भोजन बासी (सीतल) रखकर ग्रहण करना प्रचलित है।
  • पूजा के बाद गेहूँ के आटे के दीये जलाने की परंपरा है।
  • माता को जौ (सफेद जौ) अर्पण करना विशेष माना गया है।
  • शीतला माता की पूजा में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।
  • रोग-मुक्ति की कामना से पूजा के दिन आहार-शुद्धि रखें।