कलश स्थापना किसी भी शुभ कार्य, पूजा, व्रत या अनुष्ठान के आरंभ में कलश स्थापित करने की वैदिक विधि है। कलश को समस्त देवताओं का प्रतीक माना गया है। इस लेख में कलश स्थापना की संपूर्ण विधि, सामग्री, मंत्र और नियम की जानकारी सरल भाषा में दी गई है।

कलश स्थापना का महत्व

कलश को सभी देवताओं के निवास का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि कलश में भगवान विष्णु, शिव, गणेश, देवी और वरुण देव की शक्ति का वास होता है। कर्मकांड में सभी पूजन-हवन आदि अनुष्ठानों में कलश स्थापना का विधान है। कलश स्थापना से पूजा स्थल पवित्र होता है और सभी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। विवाह, गृह प्रवेश, व्रत, नवरात्रि, दुर्गा पूजा आदि सभी शुभ कार्यों की शुरुआत में कलश स्थापना की जाती है।

कलश स्थापना कब करें?

  • किसी भी शुभ कार्य या पूजा के आरंभ में।
  • व्रत, हवन और अनुष्ठान में।
  • नवरात्रि, दुर्गा पूजा आदि पर्वों पर।
  • शुभ मुहूर्त में — रात्रि में कलश स्थापना का निषेध माना गया है; आवश्यक होने पर अमंत्रक स्थापना की जाती है।

कलश स्थापना की सामग्री

  • ताम्र या मिट्टी का कलश,
  • गंगाजल या शुद्ध जल,
  • रोली, कुमकुम, अक्षत,
  • आम के पत्ते (5-7), नारियल, मौली (कलावा),
  • सुपारी, सिक्का, दूर्वा, कुश,
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर),
  • सप्तधान्य (सात अनाज) या धान,
  • पुष्प, पुष्पमाला,
  • धूप, दीपक, कपूर, घंटी,
  • लाल वस्त्र।

कलश स्थापना विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — वेदी की तैयारी

पूजा स्थल को स्वच्छ करें। भूमि पर रोली-कुमकुम या अबीर-गुलाल से अष्टदल कमल का चिह्न बनाएं। उस पर धान्यपुंज (धान या सप्तधान्य का ढेर) बनाएं। पूजा स्थान की शुद्धि के लिए गंगाजल छिड़कें।

चरण 2 — भूमि स्पर्श

कलश रखने वाली भूमि को हाथ से स्पर्श करते हुए भूमि मंत्र का उच्चारण करें:

ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री। पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृंह पृथिवीं मा हि सीः॥

चरण 3 — धान्य का पुंज बनाना

अष्टदल के मध्य में सप्तधान्य या धान का पुंज बनाते हुए मंत्र का उच्चारण करें:

ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनुप्रसितिमायुषे द्यां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः। प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि॥

चरण 4 — कलश की तैयारी

कलश में गंगाजल या शुद्ध जल भरें। कलश के मुख (गले) पर सुपारी और सिक्का रखें। कलश की गर्दन पर मौली (कलावा) या लाल वस्त्र बांधें। कलश पर रोली-कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। कलश के मुख पर आम के पत्ते लगाएं और ऊपर नारियल (मौली से लपेटा हुआ) स्थापित करें।

चरण 5 — कलश स्थापना

तैयार कलश को धान्यपुंज के ऊपर सावधानीपूर्वक स्थापित करें। कलश स्थापना के समय मंत्र का उच्चारण करें:

ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद् रयिः॥

चरण 6 — कलश में वरुण देव का आवाहन एवं पूजन

कलश में वरुण देव का आवाहन करें — वरुण को जल के अधिष्ठाता देवता माना गया है। आवाहन के बाद कलश का षोडशोपचार से पूजन करें:

ॐ अपां पतये वरुणाय नमः। ॐ वरुणाय नमः आवाहनं समर्पयामि।

कलश पर चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करते हुए मंत्र का उच्चारण करें:

ॐ वरुणाय नमः [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] के स्थान पर उस समय अर्पित की जाने वाली वस्तु का नाम बोलें — जैसे “… नमः गन्धाक्षतं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि”, “… नमः नैवेद्यं समर्पयामि” आदि।

चरण 7 — मुख्य पूजा का आरंभ

कलश स्थापना के बाद मुख्य देवता की पूजा, हवन या व्रत का आरंभ करें। पूजा समाप्ति के बाद कलश का विसर्जन करें — कलश का जल किसी वृक्ष की जड़ में या जल स्रोत में विसर्जित करें।

कलश स्थापना के नियम

  • कलश स्थापना शुभ मुहूर्त में करें।
  • रात्रि में कलश स्थापना का निषेध माना गया है।
  • कलश का उपयोग करने से पहले उसे स्वच्छ करें।
  • कलश को पूर्व या उत्तर दिशा में स्थापित करें।
  • पूजा के दौरान कलश को स्थान से न हिलाएं।
  • कलश सदा दो बाती वाले दीपक के साथ रखा जाता है।
  • पूजा समाप्ति के बाद कलश का विसर्जन करें।

कलश स्थापना से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए घटस्थापना विधि और दीप प्रज्वलन विधि भी देखें।