काल भैरव जयंती (भैरव अष्टमी) मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने काल भैरव रूप में अवतार लिया था। इस लेख में काल भैरव जयंती पूजा की संपूर्ण विधि, सामग्री, मंत्र, मुहूर्त और नियम बताए गए हैं।

काल भैरव जयंती का महत्व

भगवान शिव के रौद्र स्वरूप काल भैरव को काशी (वाराणसी) का कोतवाल भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार जब ब्रह्मा जी ने अहंकार में आकर भगवान शिव का अपमान किया, तब महादेव के क्रोध से काल भैरव का प्राकट्य हुआ, जिन्होंने अहंकार का नाश कर धर्म की रक्षा की। काल भैरव से काल (मृत्यु) भी भयभीत रहता है। मान्यता है कि इनकी पूजा करने से भय, रोग, अकाल मृत्यु, नकारात्मक शक्तियाँ और शत्रु बाधाएँ दूर होती हैं। साथ ही राहु, केतु और शनि के दोष शांत होते हैं।

काल भैरव जयंती कब मनाई जाती है?

  • काल भैरव जयंती: मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि।
  • पूजा समय: भैरव की पूजा निशित काल (रात्रि लगभग 12 बजे) में करना सबसे शुभ माना गया है। सुविधा अनुसार दिन में भी पूजन किया जा सकता है।

काल भैरव जयंती पूजा की सामग्री

  • काल भैरव की प्रतिमा या चित्र,
  • लाल वस्त्र, रोली, कुमकुम, अक्षत, अबीर,
  • सरसों का तेल, दीपक, जनेऊ,
  • काले तिल, उड़द दाल, नारियल,
  • इमरती/जलेबी, मिठाई (नैवेद्य), पान-सुपारी,
  • फूल, फूल माला, धूप, कपूर।

काल भैरव जयंती पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — स्नान एवं संकल्प

प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और हाथ में जल, चावल एवं फूल लेकर व्रत-पूजन का संकल्प लें:

ॐ कालभैरवाय नमः संकल्पमहं करिष्ये।

चरण 2 — चौकी स्थापना

पूजा स्थल पर लकड़ी की चौकी रखकर उस पर लाल कपड़ा बिछाएँ और काल भैरव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

चरण 3 — गणेश पूजन

पूजा के आरंभ में भगवान गणेश का पूजन करें:

ॐ गं गणपतये नमः।

चरण 4 — काल भैरव का पूजन

काल भैरव को फूल माला अर्पित करें, तिलक लगाएँ और सरसों के तेल का दीपक जलाएँ। रोली, अबीर, चावल, फूल, जनेऊ एक-एक करके अर्पित करते हुए मंत्र का जाप करें:

ॐ कालभैरवाय नमः [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] के स्थान पर उस समय अर्पित की जा रही वस्तु का नाम बोलें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि।

चरण 5 — भोग अर्पण

भगवान काल भैरव को नारियल, मिठाई, इमरती/जलेबी, काले तिल, उड़द दाल और पान अर्पित करें। ये भोग भगवान भैरव को अत्यंत प्रिय माने गए हैं।

चरण 6 — मंत्र जाप

पूजा के दौरान "ॐ कालभैरवाय नमः" या "ॐ भैरवाय नमः" मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। संभव हो तो बटुक भैरव कवच या काल भैरव स्तोत्र का पाठ करें:

ॐ कालभैरवाय नमः। ॐ भैरवाय नमः।

चरण 7 — रात्रि जागरण एवं दीपदान

जो भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं, वे रात्रि के निशित काल मुहूर्त में पूजा करते हैं। रात में भैरव मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाना और रात्रि जागरण करना शुभ माना गया है।

चरण 8 — आरती, दान एवं कुत्ते को भोजन

अंत में भगवान काल भैरव की आरती करें। काल भैरव का वाहन कुत्ता है, इसलिए इस दिन कुत्ते को मीठी रोटी या जलेबी खिलाना अत्यंत शुभ माना गया है। गरीबों को भोजन, वस्त्र या कंबल दान करें।

काल भैरव जयंती पूजा के नियम

  • निशित काल (रात्रि) में पूजा करना सबसे शुभ माना गया है।
  • पूजा में सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
  • व्रत के दिन वाणी में संयम रखें, चुगली एवं अपशब्द न करें।
  • तामसिक आहार से परहेज करें।
  • काले कुत्ते को भोजन कराना और जरूरतमंदों को दान देना शुभ है।