गोवर्धन पूजा कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है — यह दीपावली के अगले दिन आती है और इसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा और अन्नकूट (अन्न के ढेर) का भोग किया जाता है। यह पूजा भगवान कृष्ण की गोवर्धन-धारण लीला से जुड़ी हुई मानी जाती है। इस लेख में गोवर्धन पूजा की सामग्री, गोवर्धन बनाने की विधि, पूजन, अन्नकूट और नियम दिए गए हैं।

गोवर्धन पूजा का संबंध कृष्ण भक्ति से है; सामान्य कृष्ण पूजा की विधि कृष्ण पूजा विधि पृष्ठ पर देखें।

गोवर्धन पूजा का महत्व

परंपरा में गोवर्धन पूजा को प्रकृति और अन्न-धन की पूजा के रूप में माना जाता है। कथा-परंपरा के अनुसार कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की प्रेरणा दी थी, क्योंकि गोवर्धन से ही ब्रज के लोगों को चरागाह और अन्न-जल की प्राप्ति होती थी। इस दिन अन्नकूट — विभिन्न प्रकार के अन्न, सब्जियों और मिठाइयों का ढेर — भगवान को अर्पित करने का प्रचलन है। गोवर्धन पूजा का मूल भाव कृतज्ञता और प्रकृति-पूजा है।

गोवर्धन पूजा कब होती है?

गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (दीपावली के अगले दिन) को मनाई जाती है। यह अधिकांशतः अक्टूबर-नवंबर में आती है। कुछ क्षेत्रों में यही दिन पदवा/प्रतिपदा और नव संवत्सर/बलिप्रतिपदा के रूप में भी मनाया जाता है। सटीक तिथि के लिए स्थानीय पंचांग देखें।

गोवर्धन पूजा की सामग्री

  • स्वच्छ गोबर (गोवर्धन बनाने हेतु),
  • विविध अन्न — गेहूँ, चावल, दालें, और अन्नकूट हेतु सब्जियाँ-मिठाइयाँ,
  • पूजा की थाली, फूल, अक्षत, कुमकुम,
  • दीपक, धूप, कपूर,
  • नैवेद्य — केला, मिश्री, खीर/पंचमेवा,
  • कृष्ण की मूर्ति/चित्र,
  • घंटी, आसन, पूजा का जल।

गोवर्धन पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — गोवर्धन (पर्वत) बनाना

प्रातः घर के आंगन/पूजा स्थल को साफ करें और स्वच्छ गोबर से गोवर्धन पर्वत का आकार बनाएं। बीच में फूलों से सजाएँ और उस पर कृष्ण/गोविंद की छोटी मूर्ति या चित्र स्थापित करें। कुछ क्षेत्रों में गोवर्धन को गायों के पास या आंगन में रखा जाता है।

चरण 2 — संकल्प एवं गणेश स्मरण

स्नान कर संकल्प करें ('अमुक' स्थानों पर अपनी जानकारी भरें) और गणेश स्मरण करें।

ॐ गं गणपतये नमः।
मम उपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा श्रीगोवर्धनधरप्रीत्यर्थं
गोवर्धनपूजां करिष्ये।

चरण 3 — गोवर्धन का पूजन

गोवर्धन पर्वत (गोबर से बने) और उस पर विराजमान कृष्ण का पूजन करें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा। प्रचलित प्रारूप:

ॐ गोवर्धनधराय नमः [उपचार] समर्पयामि।
ॐ कृष्णाय नमः [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।

चरण 4 — अन्नकूट का भोग

विविध अन्न, सब्जियों और मिठाइयों का अन्नकूट — एक ढेर/पर्वत के आकार में — भगवान को अर्पित करें। यह भोग क्षेत्रीय सामग्री के अनुसार होता है। भोग के बाद परिवार और पड़ोसियों में प्रसाद बाँटें।

चरण 5 — परिक्रमा

गोवर्धन की परिक्रमा करने का प्रचलन है — घर के बने गोवर्धन की परिक्रमा और मंदिरों में गोवर्धन पर्वत की यात्रा/परिक्रमा। परिक्रमा करते समय भगवान के नाम का स्मरण करें।

चरण 6 — गो-पूजन (वैकल्पिक)

कई क्षेत्रों में गोवर्धन पूजा के साथ गाय की पूजा का भी प्रचलन है — गाय को सजाकर तिलक करना और उसे पौष्टिक आहार देना। यह प्रकृति-कृतज्ञता के भाव से जुड़ा प्रचलन है।

चरण 7 — आरती एवं प्रसाद

अंत में कृष्ण की आरती करें — आरती कुंजबिहारी की — और अन्नकूट-प्रसाद वितरित करें।

गोवर्धन पूजा के नियम

  • गोवर्धन बनाने हेतु स्वच्छ और ताजा गोबर का उपयोग करें।
  • अन्नकूट में सात्विक भोजन-व्यंजन रखें।
  • प्रसाद का वितरण बिना भेदभाव के करें — यही इस पर्व का मूल भाव है।
  • गोवर्धन को पूजा के बाद कई क्षेत्रों में घर की दीवार/आंगन में सुखाकर रखा जाता है — पारिवारिक प्रथा के अनुसार।

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