देव दिवाली (देव दीपावली) कार्तिक पूर्णिमा की रात मनाई जाती है। यह देवताओं की दीपावली मानी जाती है और इसका विशेष आयोजन वाराणसी (काशी) के घाटों पर होता है। इस लेख में देव दिवाली पूजा की संपूर्ण विधि, सामग्री, मंत्र और नियम बताए गए हैं।

देव दिवाली का महत्व

पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार से शंखासुर राक्षस का वध हुआ। इस विजय की खुशी में देवताओं ने गंगा तट पर सहस्रों दीप प्रज्वलित किए, जिसे देव दिवाली के रूप में मनाया जाता है। साथ ही भगवान शिव के त्रिपुरासुर वध की विजय भी इसी दिन मानी जाती है। वाराणसी के घाटों पर इस दिन लाखों दीपक जलाए जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान, दीपदान और विष्णु पूजन करने से भक्त को सभी पापों से मुक्ति मिलती है।

देव दिवाली कब मनाई जाती है?

  • देव दिवाली: कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा की रात्रि।
  • पूजा समय: प्रातः गंगा स्नान, दिन भर पूजन, सायंकाल तथा रात्रि में दीपदान।

देव दिवाली पूजा की सामग्री

  • गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, मिश्री (पंचामृत हेतु),
  • शालिग्राम या भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण की प्रतिमा,
  • पीले वस्त्र, रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन, तुलसी दल, पुष्प,
  • धूप, दीप, कपूर, दीपक, घी,
  • फल, मिठाई (नैवेद्य), अन्न-वस्त्र (दान हेतु)।

देव दिवाली पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — गंगा स्नान

देव दिवाली के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करें। संभव न हो तो घर पर गंगाजल मिले जल से स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

चरण 2 — संकल्प

पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करके पूर्व दिशा की ओर मुख करके व्रत-पूजन का संकल्प लें:

ॐ विष्णवे नमः संकल्पमहं करिष्ये।

चरण 3 — गणेश पूजन

पूजा के आरंभ में भगवान गणेश का पूजन करें:

ॐ गं गणपतये नमः।

चरण 4 — भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण का पूजन

शालिग्राम या भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण की प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेक करें और पीले वस्त्र पहनाकर चंदन, तुलसी दल, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ विष्णवे नमः [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] के स्थान पर उस समय अर्पित की जा रही वस्तु का नाम बोलें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि।

चरण 5 — माता लक्ष्मी एवं तुलसी का पूजन

माता लक्ष्मी और तुलसी माता का पूजन करें। तुलसी के पौधे के समीप दीपक जलाकर तुलसी को कुमकुम, अक्षत, चावल और नैवेद्य अर्पित करें:

ॐ लक्ष्म्यै नमः। ॐ तुलस्यै नमः।

चरण 6 — विष्णु सहस्रनाम का पाठ

देव दिवाली पर श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ या श्रवण करना अत्यंत फलदायी माना गया है। भगवान विष्णु के मंत्र का कम से कम एक माला जाप करें:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

चरण 7 — दीपदान

सायंकाल एवं रात्रि में दीपदान का विशेष विधान है। गंगा तट, घर या मंदिर में अपनी श्रद्धा अनुसार 5, 11, 21, 51 या 101 दीपक जलाएँ। मान्यता है कि देव दिवाली पर दीपदान करने से काल सर्प दोष एवं ग्रहों की पीड़ा शांत होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

चरण 8 — आरती एवं दान

अंत में भगवान विष्णु की आरती करें और प्रसाद वितरण करें। अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान करना शुभ माना गया है।

देव दिवाली पूजा के नियम

  • इस दिन गंगा स्नान और दीपदान का विशेष महत्व है।
  • तामसिक भोजन से परहेज करें और सात्विक आहार ग्रहण करें।
  • दीपदान के बाद दीपक स्वतः बुझने दें।
  • पूजा में मन शांत एवं एकाग्र रखें।
  • जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और कंबल का दान करें।