एकादशी हिंदू कैलेंडर की ग्यारहवीं तिथि है, जो प्रत्येक माह में दो बार आती है — शुक्ल पक्ष (मास की ग्यारहवीं) और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की उपासना से जुड़ा प्रचलित व्रत है। इस लेख में एकादशी व्रत एवं विष्णु पूजा की विधि, व्रत के नियम और पारण का संपूर्ण क्रम दिया गया है।

एकादशी व्रत की पूजा का मुख्य आधार विष्णु-पूजन है; विस्तृत विष्णु पूजा विधि विष्णु पूजा विधि पृष्ठ पर देखें।

एकादशी व्रत का महत्व

परंपरा में एकादशी को भगवान विष्णु का प्रिय दिन माना गया है। साल भर में 26 एकादशी होती हैं (द्विज-मास में दो अतिरिक्त)। प्रत्येक एकादशी का एक नाम और विशेष महत्व मिलता है — जैसे ज्येष्ठ शुक्ल की निर्जला एकादशी, आषाढ़ शुक्ल की देवशयनी एकादशी, कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी और मार्गशीर्ष शुक्ल की मोक्षदा/वैकुंठ एकादशी। व्रत का मूल आधार संयम, शुद्धता और विष्णु-भक्ति है।

एकादशी व्रत के नियम

  • दशमी रात्रि: कई परंपराओं में दशमी (पिछले दिन) रात को भोजन संयमित करने का प्रचलन है, ताकि एकादशी का व्रत साफ मन से शुरू हो।
  • व्रत प्रकार: कुछ लोग निर्जल (बिना पानी) व्रत रखते हैं, कुछ फलाहार करते हैं, कुछ एक समय हल्का भोजन। स्वास्थ्य के अनुसार व्रत चुनें।
  • चावल-परहेज़: अधिकांश परंपराओं में एकादशी के दिन चावल से बने भोजन से परहेज़ करने का प्रचलन है — यह पारिवारिक प्रथा पर निर्भर है।
  • दान-ध्यान: एकादशी के दिन दान, जप और ध्यान का विशेष फल माना गया है।
  • बीमार/वृद्ध/बच्चे: अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही व्रत रखें; पूर्ण व्रत अनिवार्य नहीं।

एकादशी पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — प्रातः स्नान एवं संकल्प

प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और एकादशी व्रत-पूजन का संकल्प करें। संकल्प में 'अमुक' स्थानों पर अपनी जानकारी भरें:

मम उपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा श्रीविष्णोः प्रीत्यर्थं
एकादशीव्रतपूजां करिष्ये।

चरण 2 — गणेश स्मरण एवं विष्णु ध्यान

ॐ गं गणपतये नमः।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

चरण 3 — विष्णु पूजन

विष्णु की मूर्ति/चित्र या शालिग्राम का पूजन करें। पूजा क्रम: आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान (जल/पंचामृत), वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा, पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा। प्रचलित प्रारूप:

ॐ विष्णवे नमः [उपचार] समर्पयामि।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।

तुलसी अर्पण:

ॐ विष्णवे नमः तुलसीपत्रं समर्पयामि।

चरण 4 — मंत्र जप

दिन भर प्रचलित विष्णु मंत्रों का जप करें:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो नारायणाय।
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

चरण 5 — रात्रि पूजन एवं जागरण (वैकल्पिक)

कई परंपराओं में एकादशी की रात भगवान विष्णु के नाम-संकीर्तन, स्तोत्र पाठ या भजन में व्यतीत की जाती है। जिन घरों में यह परंपरा नहीं, वहाँ संध्या पूजन और शांत जप पर्याप्त है।

चरण 6 — पारण

एकादशी का व्रत द्वादशी के दिन प्रातः स्नान के बाद पारण (व्रत खोलना) द्वारा पूर्ण होता है। पारण का सही समय पंचांग देखें। व्रत की पूर्णता पारण से ही मानी गई है।

एकादशी के विशेष दिन

  • निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल) — कुछ परंपराओं में बिना जल-अन्न के कठोर व्रत; स्वास्थ्य के अनुसार ही करें।
  • देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल) — चतुर्मास के आरंभ की एकादशी मानी जाती है।
  • देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल) — चतुर्मास समाप्ति की एकादशी।
  • मोक्षदा/वैकुंठ एकादशी (मार्गशीर्ष शुक्ल) — वैष्णव परंपरा में विशेष महत्व का दिन।

तिथि एवं मुहूर्त सदैव स्थानीय पंचांग से देखें, क्योंकि तिथि कभी-कभी दिन-रात में परिवर्तित होती है।

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