जय भैरव देवा भैरव बाबा की प्रचलित आरती है, जिसकी रचना कवि धरणीधर ने की है। इस पृष्ठ पर पूर्ण पाठ दिया गया है।

जय भैरव देवा — भैरव बाबा आरती का महत्व

यह आरती भगवान भैरव (काल भैरव) के श्वान वाहन, त्रिशूल धारण, चौमुख दीपक दर्शन और पाप उद्धारक स्वरूप का वर्णन करती है। भैरव जी को काशी के कोतवाल के रूप में विशेष पूजा जाता है।

आरती

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा। जय काली और गौरा देवी कृत सेवा॥
तुम्हीं पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक। भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक॥ जय भैरव देवा...॥
वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी। महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी॥ जय भैरव देवा...॥
तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे। चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे॥ जय भैरव देवा...॥
तेल चटकि दधि मिश्रित भाषावलि तेरी। कृपा कीजिये भैरव, करिए नहिं देरी॥ जय भैरव देवा...॥
पाँवों घूंघरू बाजत अरु डमरू डमकात। बटुकनाथ बन बालकजन मन हरषावत॥ जय भैरव देवा...॥
बटुकनाथ की आरती जो कोई नर गावे। कहे 'धरणीधर', नर मनवांछित फल पावे॥ जय भैरव देवा...॥
आरती का समय
प्रतिदिन, विशेषतः रविवार और भैरव अष्टमी पर

आरती विधि

भैरव बाबा की मूर्ति के समक्ष तेल का दीपक या चौमुख दीपक जलाकर श्रद्धापूर्वक आरती करें। रविवार को विशेष फलदायी मानी जाती है।

संदर्भ: पावित्र ग्रंथ — pavitragranth.com

लाभ

भय और बाधाओं से मुक्ति।
मनोकामना पूर्ति।
काल भैरव की कृपा।