पांडुरंग अष्टकम्

महाराष्ट्र के पंढरपुर में विराजमान पांडुरंग भगवान को विट्ठल के नाम से भी जाना जाता है। वारकरी संप्रदाय के भक्त उन्हें अपने जीवन का आधार मानते हैं। पांडुरंग अष्टकम् उन्हीं भगवान पांडुरंग की महिमा का वर्णन करने वाला स्तोत्र है। यह स्तोत्र उन भक्तों के लिए विशेष है जो भक्ति के मार्ग पर चलकर जीवन में विरक्ति और शांति पाना चाहते हैं। सरल भाषा और सरल भाव के कारण इसे सभी लोग आसानी से पढ़ सकते हैं।

पांडुरंग कौन हैं?

धार्मिक मान्यता के अनुसार पांडुरंग भगवान विष्णु का ही स्वरूप हैं, जो एक स्थान पर खड़े होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। पंढरपुर के मंदिर में भगवान की प्रतिमा ईंट पर खड़ी हुई दिखाई जाती है। कथा के अनुसार भक्त पुंडलिक की सेवा भाव देखकर भगवान उनके घर रुक गए और वहीं से पांडुरंग के रूप में प्रकट हुए। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि माता-पिता की सेवा ही भगवान की सच्ची भक्ति है। जो भक्त सेवा भाव से पांडुरंग का स्मरण करता है, वह उनकी कृपा पाता है।

सफेद वस्त्र का प्रतीक

पांडुरंग को सफेद वस्त्र पहनने वाला बताया जाता है। सफेद रंग पवित्रता, शांति और सरलता का प्रतीक है। अष्टकम् में भगवान के इसी सरल और निर्मल स्वरूप का वर्णन मिलता है। यह स्तोत्र पढ़ने वाला भक्त जीवन की जटिलताओं को छोड़कर सरलता की ओर अग्रसर होता है, ऐसा विश्वास किया जाता है। सफेद वस्त्र यह भी स्मरण कराते हैं कि भगवान की भक्ति के लिए दिखावा आवश्यक नहीं, केवल निर्मल मन पर्याप्त है।

भक्ति मार्ग और अष्टकम्

वारकरी संप्रदाय में भक्ति के माध्यम से ही ईश्वर तक पहुंचा जाता है। पांडुरंग अष्टकम् इसी भक्ति मार्ग को मजबूत करता है। जो लोग संसार के मोह में उलझे हुए हैं, उनके लिए यह स्तोत्र स्मरण कराता है कि सच्चा सुख भगवान की भक्ति में ही है। भक्ति के साथ नाम स्मरण की परंपरा वारकरी संप्रदाय की खास पहचान है। इसी परंपरा में पांडुरंग अष्टकम् को भी विशेष स्थान प्राप्त है।

विरक्ति का भाव

पांडुरंग अष्टकम् को विरक्ति से जोड़कर देखा जाता है। विरक्ति का अर्थ है मोह से मुक्त होना, न कि परिवार और संसार को त्यागना। यह स्तोत्र सिखाता है कि फल की चाह छोड़कर प्रेम और श्रद्धा से भक्ति करनी चाहिए। जो भक्त इस भाव से अष्टकम् पढ़ता है, उसके मन में संसार की वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम होती जाती है। यही विरक्ति का विकास भक्ति का सबसे बड़ा लाभ माना जाता है।

पाठ और जप

इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल या संध्या के समय किया जाता है। पांडुरंग भगवान के नाम का जप करने की भी परंपरा है। भक्ति भाव से किया गया पाठ ही फलदायी माना जाता है, इसलिए इसे करते समय मन को शांत और एकाग्र रखना चाहिए। जो लोग वारकरी संप्रदाय की दिनचर्या का पालन करते हैं, वे इस स्तोत्र को अपने नित्य कर्म का हिस्सा बनाते हैं।

पांडुरंग भगवान विष्णु का ही रूप हैं, इसलिए उनके भक्त विष्णु चालीसा का पाठ भी करते हैं। इसके साथ हनुमान चालीसा भी भक्ति को सरल बनाने में सहायक मानी जाती है।

पंडुरंग अष्टकम का पूर्ण पाठ

पाण्डुरङ्गाष्टकम्
महायोगपीठे तटे भीमरथ्या
वरं पुण्डरीकाय दातुं मुनीन्द्रैः ।
समागत्य तिष्ठन्तमानंदकंदं
परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ १॥
तटिद्वाससं नीलमेघावभासं
रमामंदिरं सुंदरं चित्प्रकाशम् ।
वरं त्विष्टकायां समन्यस्तपादं
परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ २॥
प्रमाणं भवाब्धेरिदं मामकानां
नितम्बः कराभ्यां धृतो येन तस्मात् ।
विधातुर्वसत्यै धृतो नाभिकोशः
परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ३॥
स्फुरत्कौस्तुभालङ्कृतं कण्ठदेशे
श्रिया जुष्टकेयूरकं श्रीनिवासम् ।
शिवं शांतमीड्यं वरं लोकपालं
परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ४॥
शरच्चंद्रबिंबाननं चारुहासं
लसत्कुण्डलाक्रांतगण्डस्थलांतम् ।
जपारागबिंबाधरं कञ्जनेत्रं
परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ५॥
किरीटोज्वलत्सर्वदिक्प्रांतभागं
सुरैरर्चितं दिव्यरत्नैरनर्घैः ।
त्रिभङ्गाकृतिं बर्हमाल्यावतंसं
परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ६॥
विभुं वेणुनादं चरंतं दुरंतं
स्वयं लीलया गोपवेषं दधानम् ।
गवां वृन्दकानन्ददं चारुहासं
परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ७॥
अजं रुक्मिणीप्राणसञ्जीवनं तं
परं धाम कैवल्यमेकं तुरीयम् ।
प्रसन्नं प्रपन्नार्तिहं देवदेवं
परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ८॥
स्तवं पाण्डुरंगस्य वै पुण्यदं ये
पठन्त्येकचित्तेन भक्त्या च नित्यम् ।
भवांभोनिधिं ते वितीर्त्वान्तकाले
हरेरालयं शाश्वतं प्राप्नुवन्ति ॥
॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
पाण्डुरङ्गाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।