नवग्रह पीड़ा निवारण स्तोत्र — ग्रह कष्टों से राहत
यह स्तोत्र ग्रहों की पीड़ा से राहत के लिए पढ़ा जाता है। जब जीवन में बार-बार बाधाएँ, रोग, क्लेश और अचानक संकट आते हैं, तब परंपरा में ग्रहों की शांति की ओर ध्यान दिया जाता है। नवग्रह पीड़ा निवारण स्तोत्र उन्हीं कष्टों को हल्का करने की मान्यता से जुड़ा हुआ है।
ग्रह पीड़ा किसे कहते हैं
जन्मपत्री में किसी ग्रह की स्थिति कष्टकारी मानी जाए, या कोई ग्रह अपनी महादशा-अंतर्दशा के काल में तकलीफ दे, तो उसे ग्रह पीड़ा कहा जाता है। इसके रूप में लोग स्वास्थ्य संबंधी परेशानी, मानसिक तनाव, धन की हानि, पारिवारिक कलह और कार्यों में बाधा का अनुभव करते हैं। यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था है कि ग्रहों की शांति से ये कष्ट हल्के पड़ते हैं।
स्तोत्र किससे जुड़ा है
इस स्तोत्र का प्रमुख भाग शनि देव से जुड़ा हुआ है, जिन्हें छाया पुत्र और धर्मराज यम के अग्रज के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही इसमें नवग्रहों की पीड़ा निवारण की कामना भी निहित मानी जाती है। शनि के प्रभाव को प्रबल मानते हुए शनि चालीसा और शनि पूजा विधि के साथ इस स्तोत्र को जोड़कर पढ़ने की परंपरा है।
पाठ विधि
इस स्तोत्र का पाठ शनिवार के दिन स्नान-पूजन के बाद करने की परंपरा सबसे अधिक प्रचलित है। शाम के समय घर के मुख्य द्वार या शनि की प्रतिमा के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं और शांत मन से पाठ करें। पाठ करते समय संकल्प करें कि आप पूरी श्रद्धा के साथ यह स्तोत्र पढ़ रहे हैं। जिन श्रद्धालुओं के जीवन में शनि के काल की कठिनाइयाँ रहती हैं, वे हर शनिवार इसका पाठ कर सकते हैं। नवग्रह चालीसा के साथ मिलाकर पाठ करना भी उचित माना जाता है।
ग्रह शांति के उपाय
- शनिवार के दिन तिल का तेल या काले तिल का दान करें।
- शाम को घर के प्रवेश द्वार पर तेल का दीपक जलाने की परंपरा है।
- कड़वा पदार्थ जैसे नीम, करेला या गुड़ का दान ग्रह शांति का उपाय माना गया है।
- जरूरतमंदों को गुड़-चना दान करें।
- ग्रह शांति की समग्र विधि नवग्रह पूजा विधि में दर्शाई गई है।
चुनिंदा श्लोक
इस स्तोत्र के प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं:
नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
अर्थ — नीले अंजन के समान आभा वाले, सूर्य के पुत्र, यम के अग्रज, छाया और मार्तण्ड से उत्पन्न शनैश्चर को मैं नमन करता हूँ।
कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः। सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः॥
अर्थ — कोण में स्थित, पिंगल (ताम्र वर्ण), बभ्रु, कृष्ण, रौद्र, अंतक, यम, सौरि, शनैश्चर, मंद — इन सभी नामों से शनि देव पुकारे जाते हैं, और पिप्पलाद ऋषि द्वारा उनकी स्तुति की गई है।
इस प्रकार यह स्तोत्र शनि सहित नवग्रहों की पीड़ा निवारण की आस्था से जुड़ा है। पाठ के साथ ऊपर बताए गए दान और उपाय करने से श्रद्धा का संपूर्ण भाव पूरा होता है।
नवग्रह पीड़ा निवारण स्तोत्र का पूर्ण पाठ
ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।