काशी में प्रवेश करते ही भक्त सबसे पहले काल भैरव के दर्शन की इच्छा करता है, क्योंकि परंपरा कहती है कि काशी नगरी के स्वामी काल भैरव हैं। वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर के पास स्थित काल भैरव मंदिर में हजारों श्रद्धालु पहुँचते हैं। उज्जैन में भी काल भैरव को क्षेत्र के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। इन्हीं काल भैरव की महिमा का गुणगान करने वाला स्तोत्र है कालभैरव अष्टकम।
काल भैरव कौन हैं
काल भैरव भगवान शिव के रौद्र स्वरूप माने जाते हैं। पुराणों में इन्हें शिवजी के अंश से उत्पन्न, काल का स्वामी बताया गया है — जो समय और मृत्यु से परे हैं। इनके नाम का अर्थ ही है — भय (भैरव) से दूर करने वाला। काल भैरव को काशी की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है, इसीलिए उन्हें काशिकापुराधिनाथ कहा जाता है। इनके स्वरूप में नाग, डमरू, त्रिशूल और कुत्ते का वाहन — सब कुछ रौद्र भाव का प्रतीक है।
कालभैरव अष्टकम
कालभैरव अष्टकम आठ श्लोकों में काल भैरव की स्तुति करता है। इसमें भैरव जी के रौद्र रूप, उनके आभूषण, वाहन और उनकी रक्षा शक्ति का वर्णन है। यह स्तोत्र भक्तों में साहस भरता है — यह विश्वास दिलाता है कि जो काल भैरव की शरण में है, उसे किसी भय से भयभीत नहीं होना पड़ता। यह अष्टक भैरव उपासना का एक सरल और प्रचलित रूप है।
चुनिंदा श्लोक
देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्। नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥
इस श्लोक का भाव यह है — मैं उन काल भैरव की भक्ति करता हूँ, जिनके पावन चरण कमलों की देवराज इंद्र सेवा करते हैं; जो सर्प के यज्ञसूत्र धारण करते हैं; जिनके सिर पर चंद्रमा विराजमान है; जो करुणा के भंडार हैं; जिन्हें नारद जैसे महर्षि और योगी वंदन करते हैं; जो दिगंबर हैं और काशी नगरी के स्वामी हैं। यह श्लोक काल भैरव के दिव्य और रौद्र दोनों रूपों को एक साथ सामने रखता है।
पूजा-पाठ विधि
काल भैरव की पूजा-पाठ की कुछ परंपराएँ निम्न हैं:
- भैरव अष्टमी, जो मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी होती है, काल भैरव जयंती के रूप में मनाई जाती है।
- मंगलवार और शनिवार को काल भैरव की पूजा विशेष मानी जाती है।
- पूजा में भैरव जी को काली मिर्च, उड़द की दाल और भोग अर्पित किया जाता है।
- काल भैरव को तिल और सरसों के तेल का दीपक प्रिय माना गया है।
काल भैरव अष्टकम का पूर्ण पाठ
लाभ
मान्यता है कि कालभैरव अष्टकम का पाठ शत्रुओं से सुरक्षा और भय निवारण में सहायक होता है। काल भैरव की उपासना से मन में साहस आता है और अकाल मृत्यु का भय कम होता है। जो भक्त नियम से इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, उनके जीवन में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं — ऐसी श्रद्धा पीढ़ियों से चली आ रही है।
काल भैरव की आराधना के साथ भैरव चालीसा का पाठ भी किया जा सकता है। शिव के पालनकर्ता रूप के लिए शिव चालीसा और माता के रौद्र भाव के लिए काली चालीसा पढ़ें।
ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।